तकनीक का विकास भारत की सांस्कृतिक जड़ों से जुड़कर होना चाहिए : डॉ सच्चिदानंद जोशी
नई दिल्ली, 05 अक्टूबर (हि.स.)। आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने सोमवार को कहा कि तकनीक का विकास भारत की सांस्कृतिक जड़ों से जुड़कर होना चाहिए।
डॉ जोशी ने यह बात दिल्ली स्थित इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) में आयोजित ‘सभ्यता से नवाचार तक : संस्कृति, तकनीक और भारत का आर्थिक भविष्य’ विषय पर परिचर्चा और पुस्तक लोकार्पण पर कही। इस अवसर पर लेखक संतोष तिवारी की पुस्तक ‘इंडिया टेक प्लेबुक’ का लोकार्पण किया गया।
कार्यक्रम में आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय तथा इस्पात मंत्रालय की पूर्व सचिव डॉ. अरुणा शर्मा, इंडियन बेवरेज एसोसिएशन की महासचिव डॉ. गुनवीना चड्ढा, पुस्तक के लेखक संतोष तिवारी तथा आईजीएनसीए मीडिया सेंटर के प्रमुख अनुराग पुनेठा उपस्थित रहे।
डॉ. जोशी ने कहा, संस्कृति का सीधा सम्बंध लोगों, उनके अनुभवों और उनकी अभिव्यक्तियों से है। भारत की श्रुति और स्मृति परम्पराएं इसका महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। इन परम्पराओं को संरक्षित और मजबूत करने की आवश्यकता है।
जोशी ने कहा कि यह पुस्तक भारत में तकनीकी विकास और प्रगति की बहुआयामी यात्रा को व्यापक रूप से समझने का अवसर देती है। उन्होंने आंध्र प्रदेश की अराकू घाटी का उदाहरण देते हुए कहा कि कभी नक्सली गतिविधियों से प्रभावित रहे इस क्षेत्र में आज छोटे दुकानदारों और रेहड़ी-पटरी वालों तक डिजिटल भुगतान की सुविधा पहुंच चुकी है। उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) ने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में व्यापक बदलाव किए हैं और सरकार भी इसके उपयोग को बढ़ावा दे रही है। हालांकि, उन्होंने सावधान करते हुए कहा कि एआई का बढ़ता प्रभाव जीवन को सुविधाजनक तो बना सकता है, लेकिन इससे व्यक्ति अपने सामाजिक सम्बंधों और अपनी बौद्धिक क्षमताओं से दूर भी हो सकता है।
डॉ. अरुणा शर्मा ने कहा कि पुस्तक का एक महत्वपूर्ण संदेश ‘सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था’ और समग्र दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि तकनीक के क्षेत्र में होने वाले हर नए विकास के साथ उसके लिए आवश्यक आधारभूत ढांचे और सहायक व्यवस्थाओं का विकास भी होना चाहिए। उन्होंने तकनीक के दुरुपयोग तथा क्रिप्टो और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से जुड़े जोखिमों के प्रति सावधान रहने की आवश्यकता बताई।
डॉ. गुनवीना चड्ढा ने पुस्तक को भारत की तकनीकी यात्रा से पाठकों को परिचित कराने का महत्वपूर्ण प्रयास बताया। उन्होंने कहा कि यूपीआई, फिनटेक, मेडटेक, स्पेसटेक और एआई जैसे क्षेत्रों में भारत ने उल्लेखनीय प्रगति की है। डिजिटल भुगतान ने वित्तीय लेन-देन को आसान बनाया है और इस क्षेत्र में भारत ने उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं।
पुस्तक के लेखक संतोष तिवारी ने कहा कि इस पुस्तक का उद्देश्य नई पीढ़ी को महत्वपूर्ण खनिज, एयरोस्पेस, सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम कंप्यूटिंग, परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष और इलेक्ट्रिक वाहन जैसे उभरते तकनीकी क्षेत्रों से परिचित कराना है। इन क्षेत्रों में रोजगार और नवाचार की व्यापक संभावनाएं हैं। इसके लिए अनुकूल नीतिगत वातावरण भी जरूरी है। उन्होंने ‘तकनीक आधारित विकास’ की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि ‘इंडिया टेक प्लेबुक’ का उद्देश्य उभरते तकनीकी बदलावों को पहचानना और भारत के बदलते तकनीकी परिदृश्य को सामने लाना है।
अनुराग पुनेठा ने कहा कि तकनीक, अर्थव्यवस्था और संस्कृति एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। तकनीक जिस तरह हमारे जीवन, भाषाओं, कलाओं और सामाजिक सम्बंधों को बदल रही है, उसी तरह इसके विकास को सांस्कृतिक दृष्टि से समझना भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि भारत के तकनीकी और आर्थिक भविष्य में भारतीय संस्कृति और मूल्यों को केंद्र में रखा जाना चाहिए। ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना के अनुरूप भारतीय तकनीक केवल प्रभावी ही नहीं, बल्कि मानवीय, समावेशी, संसाधनों के प्रति संवेदनशील और भारतीय मूल्यों से जुड़ी हुई होनी चाहिए।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में मीडियाकर्मी, पत्रकार और शोधार्थी उपस्थित रहे।
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हिन्दुस्थान समाचार / श्रद्धा द्विवेदी

