पर्यावरण पर व्यवहारिक कार्य करने की आवश्यकता है: सुंदरम तिवारी
नई दिल्ली, 19 अक्टूबर (हि.स.)। पर्यावरणविद एवं लेखक सुंदरम तिवारी ने सोमवार को कहा कि पर्यावरण पर व्यवहारिक कार्य करने की आवश्यकता है तभी वास्तविक परिवर्तन संभव है।
सुंदरम तिवारी ने आज जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में जेएनयू टीएफ एवं नेचर ग्रीन फ्यूचर ट्रस्ट के संयुक्त तत्वावधान में व्याख्यानमाला एवं फलदार पौधरोपण कार्यक्रम के अवसर पर यह बात कही।
इस मौके पर डॉ. दीप नारायण पांडे (एसोसिएट प्रोफेसर, डिजास्टर मैनेजमेंट), प्रो. सपना रतन शाह (अध्यक्ष, जेएनयू टीएफ) एवं प्रो. रवि रमेश चंद्र शुक्ला (महामंत्री, जेएनयू टीएफ) ने पर्यावरण संरक्षण पर सार्थक संवाद किया और परिसर में फलदार पौधे रोपे।
कार्यक्रम का उद्देश्य युवा पीढ़ी, विशेषकर शोधार्थियों और विद्यार्थियों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करना और उन्हें केवल चर्चा से आगे बढ़कर ठोस कार्य के लिए प्रेरित करना था।
सुंदरम तिवारी ने कहा, आज पर्यावरण पर सेमिनार, गोष्ठियां और भाषण तो बहुत होते हैं, लेकिन जब तक इन विचारों को जमीन पर नहीं उतारा जाएगा, तब तक वास्तविक परिवर्तन संभव नहीं है। उन्होंने विद्यार्थियों से आग्रह किया कि वे अपने आसपास पौधे लगाएँ, जल एवं ऊर्जा की बचत करें और प्रकृति के साथ संतुलित जीवनशैली अपनाएँ।
डॉ. दीप नारायण पांडे ने कहा कि बाढ़, सूखा, भूस्खलन और जलवायु परिवर्तन जैसी बढ़ती आपदाओं के पीछे पर्यावरण का असंतुलन एक बड़ा कारण है। उन्होंने कहा कि आपदा प्रबंधन की शुरुआत प्रकृति के संरक्षण से ही होती है और वृक्षारोपण, जल-संरक्षण तथा स्थानीय समुदायों की भागीदारी भविष्य के संकटों से बचाव का मजबूत आधार बन सकते हैं। उन्होंने शोधार्थियों से अपने शोध को समाज की वास्तविक समस्याओं के समाधान से जोड़ने की अपील की।
प्रो. सपना रतन शाह ने कहा कि विश्वविद्यालय परिसर केवल ज्ञान का केंद्र नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने वाला मंच भी है। विद्यार्थी देश का भविष्य हैं और पर्यावरण की रक्षा का दायित्व उन्हीं के कंधों पर है। उन्होंने छात्र-छात्राओं का आह्वान किया कि वे पर्यावरण संरक्षण को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाएँ और आज रोपे गए पौधों की देखभाल का संकल्प लें।
प्रो. रवि रमेश चंद्र शुक्ला ने कहा कि पर्यावरण की रक्षा सामूहिक जिम्मेदारी है, जिसमें शिक्षक, शोधार्थी और विद्यार्थी सभी की सक्रिय भागीदारी जरूरी है। फलदार पौधे पर्यावरण को हरा-भरा बनाने के साथ पक्षियों और जीव-जंतुओं के लिए आश्रय एवं आहार का स्रोत भी बनते हैं। ऐसे आयोजन समाज को प्रकृति से जुड़ने की प्रेरणा देते हैं।
कार्यक्रम के दौरान शोधार्थियों और छात्र-छात्राओं ने भी अपने विचार साझा किए तथा वक्ताओं से पर्यावरण से जुड़े प्रश्न भी पूछे।
इस अवसर पर बड़ी संख्या में शोधार्थी, छात्र-छात्राएँ एवं प्रोफेसर भी उपस्थित रहे।
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हिन्दुस्थान समाचार / श्रद्धा द्विवेदी

