भारतीय दर्शन और संस्कृति का प्रसार सैन्य शक्ति से नहीं, शांतिपूर्ण सांस्कृतिक संबंधों से हुआ है:डॉ. विनय सहस्रबुद्धे

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भारतीय दर्शन और संस्कृति का प्रसार सैन्य शक्ति से नहीं, शांतिपूर्ण सांस्कृतिक संबंधों से हुआ है:डॉ. विनय सहस्रबुद्धे


नई दिल्ली, 16 अक्टूबर (हि.स.)। भारतीय सांस्कृतिक सम्बंध परिषद् (आईसीसीआर) के पूर्व अध्यक्ष डॉ. विनय सहस्रबुद्धे ने शुक्रवार को कहा कि दुनिया भर में भारतीय दर्शन एवम संस्कृति का प्रसार सैन्य शक्ति या विस्तारवाद से नहीं बल्कि स्वाभाविक और शांतिपूर्ण सांस्कृतिक संबंधों के माध्यम से हुआ है।

डॉ सहस्रबुद्धे ने आज दिल्ली स्थित विज्ञान भवन में भारत की सभ्यतागत विरासत और विश्व के साथ उसके सांस्कृतिक संबंधों पर केंद्रित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन ‘विश्व भर में भारत के सांस्कृतिक सम्बंध’ के समापन समारोह पर यह बात कही।

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) द्वारा आयोजित इस सम्मेलन में 50 देशों के विद्वानों और विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया।

डॉ. सहस्रबुद्धे ने भारतीय दर्शन के पांच स्तंभों आध्यात्मिक लोकतंत्र, विविधता में एकता, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, न्यासिता और 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का उल्लेख किया। उन्होंने कहा, भारत ने हमेशा प्रकृति पर विजय पाने के बजाय उसके साथ समन्वय स्थापित करने में विश्वास किया है। उन्होंने भारतीय विरासत की वैश्विक दृश्यता बढ़ाने और पड़ोसी देशों के साथ संवाद मजबूत करने पर बल दिया।

नीति आयोग के पूर्व सीईओ अमिताभ कांत ने कहा कि व्यापारियों, भिक्षुओं, विद्वानों और कलाकारों ने सदियों से भारत के सांस्कृतिक आदान-प्रदान का जीवंत नेटवर्क तैयार किया है। उन्होंने सांची, बोधगया, नालंदा और अंकोरवाट का उदाहरण देते हुए सांस्कृतिक कूटनीति के महत्व को समझाया। साथ ही, जियोग्राफिकल इंडिकेशन (जीआई) टैग, डिजिटल बिक्री और ब्रांडिंग के जरिए कारीगरों को उनके काम का उचित मूल्य दिलाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

संस्कृति मंत्रालय के सचिव विवेक अग्रवाल ने 'वसुधैव कुटुम्बकम्' के संदेश को विश्वभर में पहुंचाने के लिए साझा शोध और अकादमिक कठोरता की जरूरत बताई। वहीं, आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने सम्मेलन की रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए युवा प्रतिनिधियों की उत्साहजनक भागीदारी को इस आयोजन की एक बड़ी उपलब्धि करार दिया।

सम्मेलन के तीसरे दिन पद्म विभूषण डॉ. सोनल मानसिंह ने कहा कि चाहे सिल्क रूट हो या समुद्री मार्ग, यदि संस्कृति नहीं है तो ये मार्ग बेमानी हैं। संस्कृति ही इन संपर्कों को अर्थ देती है।

इसके अलावा, लेखक अमीश त्रिपाठी ने भारत की समुद्री परम्पराओं और भाजपा नेता विजय चौथाईवाले ने योग व बौद्ध सर्किट के जरिए सांस्कृतिक कूटनीति के महत्व पर अपने विचार रखे।

इस आयोजन में विदेशी राजनयिकों ने भी भारत के साथ अपने गहरे संबंधों को याद किया। भारत में फिजी के उच्चायुक्त जगन्नाथ सामी ने अपने पूर्वजों (गिरमिटिया मजदूरों) को याद करते हुए भावुक होकर कहा कि फिजी उनकी जन्मभूमि है और भारत मातृभूमि। वहीं, लिथुआनिया की राजदूत डायना मिकेविचिएने ने अपने देश पर भारतीय संस्कृति और संस्कृत भाषा के गहरे प्रभाव को रेखांकित किया।

सम्मेलन के साथ आयोजित 28 पैनलों वाली विशेष प्रदर्शनी भी आकर्षण का केंद्र रही। तीन दिवसीय कार्यक्रम में 50 देशों के विद्वानों और शोधकर्ताओं की भागीदारी, 1350 से अधिक प्रतिनिधियों ने कराया पंजीकरण और 28 विभिन्न सत्रों में 270 शोधपत्र प्रस्तुत किए गए।

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हिन्दुस्थान समाचार / श्रद्धा द्विवेदी

Livevns.news Desk
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