बिहार में राजग का ‘सम्राट युग’ शुरू

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बिहार में राजग का ‘सम्राट युग’ शुरू


- बिहार में सत्ता का नया युग, सम्राट मॉडल पर भाजपा की निर्णायक चाल

पटना, 14 अप्रैल (हि.स.)। बिहार की सियासत में एक ऐतिहासिक मोड़ आया है। पहली बार भारतीय जनता पार्टी के हाथ में बिहार की सत्ता होगी और सम्राट चौधरी बिहार में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री होंगे। यह बदलाव सिर्फ चेहरे का नहीं, बल्कि राजनीतिक संतुलन और रणनीति के बड़े परिवर्तन का संकेत माना जा रहा है।

बिहार की राजनीति में यह बदलाव एक नए अध्याय की शुरुआत जरूर है, लेकिन यह अध्याय कितना सफल होता है,यह आने वाले समय में सम्राट चौधरी की नेतृत्व क्षमता और भाजपा की रणनीतिक मजबूती पर निर्भर करेगा। सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना सिर्फ एक राजनीतिक नियुक्ति नहीं,बल्कि बिहार में सत्ता के नए युग की शुरुआत माना जा रहा है। अब सवाल है कि क्या भाजपा इस बदलाव को स्थायी राजनीतिक बढ़त में बदल पाएगी या यह प्रयोग भी बिहार की जटिल सियासत में एक नया मोड़ बनकर रह जाएगा?

किंगमेकर से किंग,बिहार में भाजपा का बड़ा उभार

राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार लव कुमार मिश्रा ने कहा कि अब तक बिहार की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी सहयोगी दल की भूमिका में ही नजर आती रही,जहां सरकार की कमान नीतीश कुमार के हाथों में केंद्रित थी और भाजपा पावर शेयरिंग तक सीमित रही। लेकिन, सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना इस स्थापित धारणा को पूरी तरह बदल देता है। यह बदलाव संकेत देता है कि भाजपा अब केवल गठबंधन की साझेदार नहीं,बल्कि बिहार की सत्ता का मुख्य केंद्र बनने की दिशा में आगे बढ़ चुकी है,जो राज्य की राजनीति में एक बड़े परिवर्तन का प्रतीक माना जा रहा है।

ओबीसी कार्ड से संगठन शक्ति तक

वरिष्ठ पत्रकार सियाराम पाण्डेय की मानें तो बिहार में सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री पद के लिए आगे बढ़ाना महज एक राजनीतिक नियुक्ति नहीं, बल्कि भारतीय जनता पार्टी की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। पार्टी ने इस फैसले के जरिए सामाजिक समीकरण,संगठनात्मक ताकत और आक्रामक राजनीति तीनों को साधने की कोशिश की है।

सम्राट चौधरी का चयन यूं ही नहीं हुआ। इसके पीछे तीन बड़े फैक्टर ओबीसी समीकरण, संगठन पर पकड़ और आक्रामक राजनीति काम कर रहे हैं। सम्राट चौधरी का सामाजिक आधार भाजपा को बिहार में पिछड़े वर्गों के बीच नई मजबूती दे सकता है। लंबे समय से पार्टी में सक्रिय रहने के कारण उनकी जमीनी पकड़ मजबूत मानी जाती है,जिससे कार्यकर्ताओं में बेहतर समन्वय की उम्मीद है। विपक्ष पर सीधा और तीखा हमला उनकी पहचान रहा है,जिससे भाजपा अपने कोर वोटर को और सक्रिय रखना चाहती है। यह वही फॉर्मूला है जो भाजपा ने कई राज्यों में अपनाया है।

नीतीश के बाद नई बिसात, भाजपा का नया पावर बैलेंस

लंबे समय तक बिहार की राजनीति का केंद्र रहे नीतीश कुमार अब सत्ता के केंद्र में नहीं हैं। वहीं, भाजपा एक नया पावर बैलेंस बना रही है। भारतीय जनता पार्टी एक नया राजनीतिक संतुलन गढ़ रही है,जिसमें नेतृत्व बदलकर भी गठबंधन की संरचना को बनाए रखा जाए। राजनीतिक विश्लेषक अरुण पांडेय का मानना है कि भाजपा एक ओर अपने नेतृत्व को स्थापित कर रही है, तो दूसरी ओर पुराने सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह तोड़ने के बजाय उन्हें नए ढंग से संतुलित करने की रणनीति पर भी काम कर रही है। ऐसे में यह बदलाव सिर्फ नेतृत्व परिवर्तन नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति के नए समीकरणों की शुरुआत भी हो सकता है।

लंबी रणनीति का खेल, भाजपा का सम्राट प्लान

राजनीतिक विश्लेषक लव कुमार मिश्र का मानना है कि यह फैसला सिर्फ वर्तमान के लिए नहीं,बल्कि आने वाले चुनावों को ध्यान में रखकर लिया गया है। भारतीय जनता पार्टी अब राज्य में अपनी स्वतंत्र पहचान और नेतृत्व के दम पर सत्ता हासिल करने की दिशा में स्पष्ट रूप से आगे बढ़ रही है। यह कदम पार्टी की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है। इसके तहत भाजपा अब अपने चेहरे पर चुनाव लड़ने की स्थिति में आना चाहती है। सम्राट चौधरी को दीर्घकालिक निवेश के रूप में तैयार किया जा रहा है। पार्टी बिहार में पूर्ण बहुमत हासिल करने की रणनीति पर काम कर रही है। इस बदलाव को संकेत के तौर पर देखा जा रहा है कि भाजपा अब गठबंधन की राजनीति से आगे बढ़कर बिहार में अपने दम पर मजबूत राजनीतिक आधार बनाने की कोशिश में है।

चुनौतियां भी कम नहीं, पहली ही पारी में अग्निपरीक्षा

इस बड़े राजनीतिक दांव के साथ चुनौतियां भी कम नहीं हैं। मुख्यमंत्री बनने के साथ ही सम्राट चौधरी के सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं। भारतीय जनता पार्टी के पहले मुख्यमंत्री के तौर पर उनसे अपेक्षाएं भी कहीं ज्यादा हैं। ऐसे में उनकी अग्निपरीक्षा तुरंत शुरू मानी जा रही है। मुख्यमंत्री बनने के साथ ही उन्हें कई मोर्चों पर खुद को साबित करना होगा। प्रशासनिक अनुभव को साबित करना,गठबंधन समीकरण संभालना,विकास बनाम जातीय राजनीति का संतुलन, कानून-व्यवस्था और रोजगार जैसे मुद्दों पर ठोस परिणाम देना उनकी सबसे बड़ी परीक्षा होगी। ऐसे में सम्राट चौधरी के लिए यह सिर्फ पद संभालने का मौका नहीं,बल्कि खुद को एक प्रभावी और परिणाम देने वाले नेता के रूप में स्थापित करने की बड़ी परीक्षा भी है।---------------

हिन्दुस्थान समाचार / डॉ .राजेश

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