बाहरी अधिकार नहीं, आंतरिक बल है असली सशक्तिकरण: रामबहादुर राय

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बाहरी अधिकार नहीं, आंतरिक बल है असली सशक्तिकरण: रामबहादुर राय


नई दिल्ली, 09 अप्रैल (हि.स.)। इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) के अध्यक्ष रामबहादुर राय ने गुरुवार को कहा कि सीता का अस्तित्व हमें याद दिलाता है कि नारी सशक्तिकरण बाहरी परिस्थितियों पर आधारित नहीं होता। वह तो आत्मशक्ति और आत्मज्योति की सतत रक्षा करते रहने की आंतरिक प्रक्रिया है।

रामबहादुर राय ने यह बात दिल्ली स्थित आईजीएनसीए में बुधवार शाम पुस्तक ‘वीमेन इन द वूम ऑफ टाइम: अनविलिंग एंशियंट फेमिनिज्म’ (समय के गर्भ में स्त्रियां : प्राचीन स्त्री विमर्श) के लोकार्पण एवं चर्चा के दौरान कही। इस पुस्तक के लेखक मुकुल कुमार और प्रकाशक ब्लू वन इंक हैं।

रामबहादुर राय ने कहा, “हमारे यहां नारी के प्रति जो अवधारणा रही है अगर उसको सही तरीके से समझना हो तो दुर्गा सप्तशती के ‘नमस्तेअस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे। महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि॥ त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्यें शत्रूणां भयवर्धिनि। प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता।।’ अंश को पढ़ना चाहिए। हमने भारतीय नारी में यह बल देखा है।” उन्होंने ‘वीमेन इन द वूम ऑफ टाइम’ के इस अंश को उद्धृत करते हुए कहा कि यह वाक्य अपने आप में इस पुस्तक को बहुत पूर्णता प्रदान करता है। दरअसल यह पुस्तक एक दृष्टि से पूरा समग्र भारतीय इतिहास है।

डॉ. सोनल मानसिंह ने कहा कि हमारी पारम्परिक शब्दावली का अंग्रेजी में अनुवाद करना बहुत कठिन है क्योंकि अंग्रेजी अक्सर उन शब्दों के पीछे की भावना और गहराई को पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पाती जो हमारी सांस्कृतिक परम्पराओं में निहित हैं। इसी प्रकार पुराण के लिए ‘माइथोलॉजी’ शब्द भी उचित नहीं है। ‘पुराण’ का अर्थ है: बहुत प्राचीन घटनाएं जो सामूहिक स्मृति में संरक्षित हैं। इन्हें काल्पनिक कथा कहना गलत है। इसलिए हमें ‘माइथोलॉजी’ के स्थान पर कोई उपयुक्त शब्द खोजना होगा। हमें अपनी प्राचीन परम्पराओं, विशेषकर जनजातीय परम्पराओं को भी समझना चाहिए। ये केवल लोककथाएं नहीं बल्कि आज भी जीवित परम्पराएं हैं।

प्रो. मालाश्री लाल ने कहा कि मुकुल कुमार की यह पुस्तक सिद्ध करती है कि एक पुरुष विद्वान भी संतुलित, स्पष्ट, गहन शोधयुक्त और ईमानदार दृष्टिकोण से नारीवाद को समझ सकता है। समय के साथ नारीवाद में एक दुर्भाग्यपूर्ण विभाजन उत्पन्न हो गया है जहां इस शब्द को एक तीव्र और आक्रामक विरोध के रूप में देखा जाने लगा है।

लेखक मुकुल कुमार ने कहा कि नारीवाद या स्त्रीत्व आज के समय की एक ऐसी सामाजिक परिघटना है जो लगभग हर संवेदनशील व्यक्ति को प्रभावित करती है। यह हमारे देश में आज सबसे महत्वपूर्ण समाजशास्त्रीय प्रवृत्तियों में से एक है। मेरे भीतर इतिहास-बोध से जुड़ा एक प्रश्न बार-बार उठता था, आख़िर नारीवाद ही क्यों? पुरुषवाद क्यों नहीं? मैं यह समझना चाहता था कि यह विचार वास्तव में आया कहां से? इसी उद्देश्य से यह पुस्तक लिखी गई।

प्रो. रमेश चंद्र गौड़ ने कहा कि पुस्तक में कौटिल्य के अर्थशास्त्र के कई उद्धरण हैं, जिससे पता चलता है कि आज जो कार्यस्थल पर स्त्रियों की सुरक्षा को लेकर कानून और दिशा-निर्देश तैयार किए जा रहे हैं उसको लेकर भारत में कई शताब्दी पूर्व विचार किया जा चुका है। यह विस्मित करने वाली जानकारी है।

स्त्री विमर्श पर बात करते हुए प्रो. सविता रॉय ने कहा कि भारतीय परम्परा में स्त्री और पुरुष को समान दृष्टि से देखा गया है। इसलिए हमें अपनी जड़ों की ओर और संस्कृति की ओर लौटना चाहिए।

इस कार्यक्रम की अध्यक्षता आईजीएनसीए ट्रस्ट के अध्यक्ष रामबहादुर राय ने की। इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि पद्म विभूषण से सम्मानित नृत्य गुरु एवं पूर्व राज्यसभा सांसद डॉ. सोनल मानसिंह, दिल्ली विश्वविद्यालय की पूर्व प्रोफेसर एवं लेखिका प्रो. मालाश्री लाल, दिल्ली विश्वविद्यालय के दौलत राम कॉलेज की प्राचार्य प्रो. सविता रॉय और आईजीएनसीए के डीन व कला निधि प्रभाग के प्रमुख प्रो. (डॉ.) रमेश चन्द्र गौड़ सहित अन्य गणमान्य जन उपस्थित थे।

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हिन्दुस्थान समाचार / श्रद्धा द्विवेदी

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