अटल जी कहते थे, 'मैं मृत्यु से नहीं, बदनामी से डरता हूं'
नई दिल्ली, 29 मई (हि.स.)। वरिष्ठ पत्रकार एवं पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के मीडिया सलाहकार अशोक टंडन ने अटल के कार्यकाल, उनकी कूटनीति, निजी जीवन और उस दौर के कई अनसुने और बेहद दिलचस्प संस्मरणों को साझा करते हुए शुक्रवार को कहा कि वाजपेयी ने भीषण गर्मी और सरकार के 6 महीने बचे होने के बावजूद जल्दी चुनाव कराना इसलिए स्वीकार किया, क्योंकि वे समय पर चुनाव हारने की बदनामी से बचना चाहते थे। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की जीत के बाद उन्हें डर था कि अगर बाद में हारे तो लोग कहेंगे कि 6 महीने की सत्ता बचाने के लिए जीता हुआ चुनाव हरवा दिया। वे कहते थे, मैं मृत्यु से नहीं, बदनामी से डरता हूं।
टंडन ने दिल्ली के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में शुक्रवार को पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी के जीवन और उनकी विरासत पर आधारित एक वृत्तचित्र- 'शत शत अटल' की स्क्रीनिंग और 'अटल संस्मरण' पुस्तक पर चर्चा के दौरान यह बात कही।
वृत्तचित्र के निर्देशक अतुल पांडेय और निर्माता अतुल गंगवार हैं। इसके साथ ही 'अटल संस्मरण' पुस्तक पर एक आत्मीय संवाद का आयोजन किया गया, जो अटल जी के जीवन, उनके विचारों और देश के लिए छोड़ी गई विरासत पर प्रकाश डालती है। इस पुस्तक के लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं अटल बिहारी वाजपेयी के पूर्व मीडिया सलाहकार अशोक टंडन हैं।
अशोक टंडन ने हवाई जहाज में वाजपेयी के साथ हुई बातचीत का हवाला देते हुए बताया कि जब अटल से पूछा गया कि सरकार के 6 महीने बचे होने और भीषण गर्मी के बावजूद उन्होंने जल्दी चुनाव कराना क्यों स्वीकार किया? इस पर वाजपेयी का जवाब उनकी दूरदर्शी सोच को दिखाता था। उन्होंने कहा था, अगर मैं मना करता तो सब मान जाते और चुनाव समय पर होते लेकिन अगर हम समय पर चुनाव हार जाते, तो लोग कहते कि वाजपेयी ने अपनी 6 महीने की सरकार बचाने के लिए जीता हुआ चुनाव हरवा दिया (क्योंकि भाजपा तब राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जीती थी)। वाजपेयी ने स्पष्ट किया था कि वे मृत्यु से नहीं, बदनामी से डरते थे।
अशोक टंडन के मुताबिक 1994 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी को जेनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का अध्यक्ष बनाकर भेजा था। पाकिस्तान ने कश्मीर में मानवाधिकार उल्लंघन का प्रस्ताव लाकर भारत को वैश्विक स्तर पर अलग-थलग करने की पूरी तैयारी कर ली थी।
पश्चिमी देश भारत के साथ तो थे लेकिन उन्होंने साफ कह दिया था कि वे मानवाधिकार के मुद्दे पर भारत का साथ नहीं दे सकते और ज़्यादा से ज़्यादा तटस्थ रहेंगे। ऐसा लग रहा था कि भारत यह प्रस्ताव हार जाएगा।
इस संकट के समय नरसिम्हा राव और अटल की जुगलबंदी ने कमाल किया। भारत के अनुरोध पर ईरान के राष्ट्रपति ने तत्कालीन पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो को सीधे फोन कर प्रस्ताव वापस लेने का दबाव बनाया। नतीजा यह हुआ कि वोटिंग के दिन सुबह पाकिस्तान को अपना प्रस्ताव वापस लेना पड़ा। अगले दिन ब्रिटिश अखबारों की हेडलाइन थी- इंडिया-ईरान-चाइना एक्सिस इमर्जिंग। बाद में इसी 'धुरी' को तोड़ने के लिए अमेरिका ने भारत को इंडो-यूएस न्यूक्लियर डील का ऑफर दिया था।
वर्ष 1996 में जब भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं था, तब राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा ने अटल जी को प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने का न्योता दिया था। इस पर टंडन ने एक बड़ा खुलासा करते हुए बताया कि राष्ट्रपति की पत्नी विमला शर्मा, जो मध्य प्रदेश से ताल्लुक रखती थीं, अटल की बहुत बड़ी प्रशंसक थीं। उन्होंने ही ब्रिटिश संवैधानिक व्यवस्था का हवाला देकर डॉ. शंकर दयाल शर्मा को समझाया था कि सबसे बड़ी पार्टी के नेता को सरकार बनाने का न्योता दिया जाना चाहिए।
उन्होंने बताया कि भाजपा के अधिकांश वरिष्ठ नेता सरकार बनाने के पक्ष में नहीं थे क्योंकि संख्या बल नहीं था। सुषमा स्वराज और प्रमोद महाजन के बीच तीखी बहस हुई थी लेकिन महाजन ने कहा कि भाजपा पर लगा अछूत और विपक्ष का टैग' तोड़ने का इससे बेहतर मौका नहीं मिल सकता है, इसे गंवाना नहीं चाहिए। प्रमोद महाजन की बात मानी गई, 13 दिन की सरकार गिरी ज़रूर, लेकिन वहीं से आगे चलकर 1998 में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के उदय का रास्ता साफ हुआ।
एनडीए सरकार के दौरान जब राष्ट्रपति उम्मीदवार की तलाश चल रही थी, तो भाजपा के भीतर से ही यह सुझाव आया कि किसी भी तरह के चुनावी टकराव से बचने के लिए क्यों न खुद अटल बिहारी वाजपेयी को ही देश का राष्ट्रपति बना दिया जाए लेकिन अटल ने इस प्रस्ताव को कड़ाई से खारिज कर दिया। उनका मानना था कि भारत जैसे संसदीय लोकतंत्र में, यदि देश का सर्वमान्य नेता (प्रधानमंत्री) केवल अपने इलेक्टोरल कॉलेज के संख्या बल के दम पर राष्ट्रपति भवन जाता है, तो यह एक बेहद गलत और खतरनाक परंपरा की शुरुआत होगी, जो भविष्य में लोकतांत्रिक ढांचे को नुकसान पहुंचा सकती है।
टंडन ने पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल विष्णु भागवत का हवाला देते हुए बताया कि एक महिला पत्रकार ने कारगिल युद्ध के दौरान वहां सैटलाइट फोन ले जाकर लाइव रिपोर्टिंग (पीस टू कैमरा) की थी। पत्रकार तो रिपोर्टिंग करके 15 मिनट में वहां से निकल गई, लेकिन सैट फोन के सिग्नल को ट्रैक करके पाकिस्तान ने उस जगह पर भारी गोलाबारी कर दी, जिसमें भारत के कई सैनिक शहीद हुए। इस मामले में बाद में सेना में कोर्ट मार्शल भी हुआ था।
इसके अलावा उन्होंने अटल और आडवाणी के बीच मधुर संबंधों पर कहा कि जब भी कोई नेता अटल से मिलता तो वे पूछते थे कि क्या आप आडवाणी से मिले। उन्होंने बताया कि नियुक्तियां, गवर्नर और पार्टी के आंतरिक मामले आडवाणी देखते थे जबकि एनडीए के सहयोगी दलों को साधने का काम खुद अटल संभालते थे। दोनों के फैसलों में कभी मतभेद नहीं होता था।
पाकिस्तान के साथ हुई आगरा समिट की विफलता का असली कारण बताते हुए टंडन ने कहा कि भारत चाहता था कि 'लाहौर डिक्लेरेशन' की तरह आगरा डिक्लेरेशन में भी आतंकवाद के खिलाफ संयुक्त लड़ाई शब्द को शामिल किया जाए लेकिन जनरल परवेज मुशर्रफ इस शब्द को रखने के लिए तैयार नहीं थे। मुशर्रफ का कहना था कि अगर वह 'आतंकवाद' शब्द पर दस्तखत करके गए, तो पाकिस्तान में किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे। इसी वैचारिक गतिरोध के कारण आगरा वार्ता विफल हो गई थी।
एक और बेहद दिलचस्प प्रशासनिक वाकया साझा करते हुए टंडन ने बताया कि वाजपेयी सरकार की पहली ही कैबिनेट बैठक में कर्मचारियों की रिटायरमेंट की उम्र 58 से बढ़ाकर 60 वर्ष करने का फैसला लिया गया था। जिसके बाद टंडन पीएमओ में ओएसडी बन गए।
अशोक टंडन के अनुसार, अटल अपनी पार्टी के तीन सांसद लालमुनि चौबे, वीरेंद्र सिंह मस्त और मनोज सिन्हा ( जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल) को प्रेम से और मज़ाक में 'तेजतर्रार युवा नेता' कहकर बुलाते थे। जब भी ये तीनों नेता एक साथ अटल से मिलने आते थे, तो वे मुस्कुराकर कहते थे, ये मेरे तीन यंग टर्क्स हैं।
अशोक टंडन ने उन भ्रांतियों को सिरे से खारिज किया, जिसमें अटल के निधन के दिन कई कांग्रेस नेताओं और टीवी एंकरों ने उनकी 'उदारवादी' विरासत को हथियाने और उन्हें संघ से अलग दिखाने की कोशिश की थी लेकिन सच यह है कि अटल पक्के स्वयंसेवक थे और संघ के सभी सरसंघचालकों के साथ उनके संबंध बेहद मधुर और स्पष्ट थे।
हिन्दुस्थान समाचार के समूह संपादक और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष राम बहादुर राय ने वाजपेयी के कार्यकाल से जुड़े कई अनसुने संस्मरण सुनाए। उन्होंने बताया कि जब देश में 'इंडिया शाइनिंग' का माहौल था और बड़े-बड़े नेता भाजपा में शामिल हो रहे थे। उस दौरान 'द हिंदू' के तत्कालीन संपादक एन. राम ने वाजपेयी से मुलाकात की थी। इस दौरान अटल ने उनसे देश का माहौल पूछा, तो राम ने बेहद बेबाकी से कहा था कि प्रधानमंत्री हमारा आकलन है कि एनडीए सत्ता में वापस नहीं आ रहा है। पूरे देश की हवा के विपरीत दी गयी इस प्रतिक्रिया पर भी अटल विचलित नहीं हुए और उन्होंने जनभावना और सहयोगियों की राय का सम्मान करना ही उचित समझा।
उन्होंने अटल जी से मुलाकात का किस्सा सुनाते हुए बताया कि हम 10-15 लोग साइकिल से 75 किलोमीटर दूर जौनपुर में राजा जौनपुर यादवेंद्र दत्त दुबे के किले में उनकी सभा को सुनने गए थे। उनसे दूसरी भेंट जो हमको कभी भूलती नहीं, हमारे लालमुनि चौबे मित्र थे। संघ के एक प्रचारक की शिकायत पर उनको अश्विनी कुमार ने जनसंघ से निलंबित कर दिया था। चौबे मेरे पास आए और कहने लगे कि ये मुझे तो जनसंघ से निकाल दिया है तब मैंने कहा कि चौबे आप चिंता मत करिए। हम लोग दिल्ली आये और अटल बिहारी वाजपेयी से मिले। मैंने वाजपेयी को बताया कि लालमुनि चौबे को जनसंघ से निकाल दिया है। उन्होंने तुरंत अश्विनी कुमार को फोन किया, कहा, मैं लालमुनि चौबे को भेज रहा हूँ, इनकी समस्या का हल करिए, इनको काम दीजिए।
एक और मुलाकात का जिक्र करते हुए राय ने बताया कि करीब 1996 में जब अटल से मुलाकात की तब एक पत्रकार के रूप में मेरे मन में लोभ यह था कि वाजपेयी से कुछ सवाल पूछ लें और हम एक इंटरव्यू छापेंगे। प्रभाष जोशी के मन में लोभ यह था कि वह जानें कि अगर राष्ट्रपति ने आपको ऑफर दे दिया, तो आप क्या करेंगे? तो एक संपादक और एक संवाददाता, दोनों ने ढाई-तीन घंटे तक वाजपेयी से बात की और वाजपेयी ने दोनों की बातों को गोल- मोल घुमा दिया।
राय ने संगठन और सरकार के बीच के एक कड़वे सच से भी पर्दा उठाया। उन्होंने बताया कि यह लालकृष्ण आडवाणी ही थे जिन्होंने वाजपेयी और अपने बीच बेहतर समन्वय के लिए ब्रजेश मिश्रा को प्रधानमंत्री का प्रधान सचिव बनवाया था लेकिन बाद में ब्रजेश मिश्रा ने आडवाणी को लगातार हाशिए पर रखा और उन्हें अपमानित किया। राय ने आडवाणी के बड़प्पन की तारीफ करते हुए कहा कि तमाम अपमान सहने के बाद भी उन्होंने वाजपेयी के प्रति अपनी निष्ठा और राजनीतिक सूझबूझ को बनाए रखा।
इस वृत्तचित्र में प्राचीन और आधुनिक दृश्यों के साथ अटल के राजनीतिक सफर की पुरानी तस्वीरों को ब्लैक एंड व्हाइट में संसदीय भाषणों की फुटेज के जरिए उनकी बेजोड़ वाकपटुता और राजनीतिक हास्य-विनोद की यादों को ताजा किया गया है। यह वृत्तचित्र न केवल एक महान राजनेता के राजनीतिक कद को दिखाता है बल्कि उनके भीतर के कवि, एक संवेदनशील इंसान और ध्येय-निष्ठ देशभक्त को भी सम्मानपूर्वक उजागर करता है। संक्षिप्त रूप में, यह देश के एक अजातशत्रु नायक को दी गई एक भावपूर्ण और प्रेरक श्रद्धांजलि है।
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हिन्दुस्थान समाचार / श्रद्धा द्विवेदी

