संस्कृति मंत्रालय ने दिनेश चंद्र जोशी की जन्म शताब्दी समारोह पर जारी किया डाक टिकट
नई दिल्ली, 15 मई (हि.स.)। दिल्ली स्थित लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय में शुक्रवार को आचार्य दिनेश चंद्र जोशी की जन्म शताब्दी समारोह और राष्ट्रीय संगोष्ठी के दौरान उनको समर्पित एक स्मारक डाक टिकट जारी किया गया। इस दौरान कार्यक्रम का उद्घाटन संस्कृति मंत्रालय के संयुक्त सचिव समर नंदा ने किया।
मंत्रालय के अनुसार इस मौके पर जारी टिकट संस्कृत विद्वत्ता और भारतीय संस्कृति में उनके अपार योगदान को मान्यता देता है। इस डाक टिकट के विमोचन के माध्यम से विद्वान के संस्कृत तथा भारतीय ज्ञान परंपराओं के संरक्षण और संवर्धन के प्रति आजीवन सेवा को राष्ट्रीय स्तर पर एक महत्वपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की गई। इस कार्यक्रम को साहित्य अकादमी और लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय और राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के सहयोग से किया। इस दौरान संस्कृत और भारतीय संस्कृति के क्षेत्र में उनके योगदान पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का भी आयोजन किया गया। यह संगोष्ठी संस्कृत विद्वान, प्रसिद्ध शिक्षाविद और संस्कृत भाषा तथा भारतीय सांस्कृतिक विरासत के विशिष्ट संवर्धक जोशी की जन्म शताब्दी के उपलक्ष्य में आयोजित की गई।
समर नंदा ने सभा को सूचित किया कि गृह मंत्री एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय कार्यान्वयन समिति ने आचार्य दिनेश चंद्र जोशी के सम्मान में 11 अप्रैल 2026 से 11 अप्रैल 2027 तक देशभर में आयोजित होने वाले स्मृति कार्यक्रमों, शैक्षणिक सेमिनारों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, प्रदर्शनियों और आध्यात्मिक सभाओं को मंजूरी दे दी है।
समर नंदा ने कहा कि दिनेश जोशी का जीवन शाश्वत प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है, जो यह दर्शाता है कि महानता सुख-सुविधाओं से नहीं बल्कि समर्पण, दृढ़ता और आंतरिक शक्ति से प्राप्त होती है।
नालंदा विश्वविद्यालय, तक्षशिला और विक्रमशिला जैसे प्राचीन शिक्षा केंद्रों के विनाश का जिक्र करते हुए, उन्होंने कहा कि ये कृत्य केवल पुस्तकों और पांडुलिपियों पर हमले नहीं थे बल्कि भारत की आत्मा और उसकी पवित्र ज्ञान परंपरा पर हमले थे।
उन्होंने कहा कि आचार्य का दृढ़ विश्वास था कि भारत की आध्यात्मिक चेतना की रक्षा के लिए संस्कृत का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। उनके लिए देशभक्ति मात्र एक भावना नहीं बल्कि एक पवित्र प्रतिज्ञा थी। उन्होंने अपना पूरा जीवन संस्कृत और भारतीय संस्कृति के पुनरुद्धार और संरक्षण के लिए समर्पित कर दिया।
उद्घाटन सत्र में लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति मुरलीमनोहर पाठक सहित कई विशिष्ट गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। अध्यक्षीय भाषण साहित्य अकादमी के अध्यक्ष माधव कौशिक ने दिया।
इस संगोष्ठी में आचार्य दिनेश चंद्र जोशी के योगदान के विभिन्न पहलुओं को समर्पित तीन अकादमिक सत्र आयोजित किए गए।
प्रथम सत्र का विषय था “आचार्य दिनेश चंद्र जोशी- वैदिक संस्कृति के महान संवर्धक” और इसकी अध्यक्षता रमाकांत पांडे ने की। प्रकाश पंत, कीर्ति वल्लभ शाक्ता और अनिल कुमार ने शोध पत्र प्रस्तुत किए।
दूसरे सत्र में आचार्य दिनेश चंद्र जोशी- पुराणिक विरासत, आध्यात्मिक चेतना और तीर्थयात्रा संस्कृति के एक प्रमुख प्रवर्तक विषय पर विचार-विमर्श किया गया। सत्र की अध्यक्षता बिहारी लाल शर्मा ने की और इसमें राम विनय सिंह, राधे श्याम गंगवार और सर्वेश कुमार तिवारी द्वारा प्रस्तुतियां शामिल थीं।
तीसरे सत्र में आचार्य दिनेश चंद्र जोशी- संस्कृत, संस्कृति और संस्कारों के राजदूत विषय पर चर्चा हुई। सत्र की अध्यक्षता ओम नाथ बिमाली ने की और प्रेम शंकर शर्मा, भारतेंदु पांडे और सुनील जोशी ने अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए।
इस मौके पर देशभर के विद्वानों, शिक्षाविदों, संस्कृत साहित्यकारों, शोधकर्ताओं और छात्रों ने संस्कृत अध्ययन, भारतीय दर्शन और सांस्कृतिक विरासत में आचार्य श्री दिनेश चंद्र जोशी के योगदान की स्थायी प्रासंगिकता पर विचार-विमर्श किया।
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हिन्दुस्थान समाचार / श्रद्धा द्विवेदी

