लोकतांत्रिक संस्थाओं की प्रासंगिकता समावेशी और जवाबदेह होने पर निर्भर : लोकसभा अध्यक्ष
नई दिल्ली, 16 जनवरी (हि.स.)। राष्ट्रमंडल के अध्यक्षों एवं पीठासीन अधिकारियों का 28वाँ सम्मेलन (सीएसपीओसी) शुक्रवार को लोकतांत्रिक संस्थाओं को और अधिक जन-केंद्रित बनाने की नवीकृत प्रतिबद्धता के साथ संपन्न हुआ। दो-दिवसीय सम्मेलन के समापन सत्र में लोक सभा अध्यक्ष ओम बिरला ने समापन संबोधन दिया।
समापन सत्र के दौरान लोक सभा अध्यक्ष ने 29वें सीएसपीओसी की अध्यक्षता यूनाइटेड किंगडम के हाउस ऑफ कॉमन्स के अध्यक्ष सर लिंडसे होयल को सौंपी तथा लंदन में आयोजित होने वाले अगले सीएसपीओसी की सफलता के लिए उन्हें शुभकामनाएँ दीं।
इस अवसर पर बिरला ने कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाएँ तभी सशक्त और प्रासंगिक बनी रह सकती हैं जब वे पारदर्शी, समावेशी, उत्तरदायी और जनता के प्रति जवाबदेह हों। उन्होंने कहा कि पारदर्शिता निर्णय-प्रक्रिया में खुलेपन को सुनिश्चित कर जनता के विश्वास को बढ़ाती है, जबकि समावेशन यह सुनिश्चित करता है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में प्रत्येक आवाज़, विशेषकर समाज के हाशिये पर खड़े लोगों की सुनी जाए और उसका सम्मान हो। उनके अनुसार, ये सिद्धांत मिलकर लोकतांत्रिक संस्थाओं की वैधता को बनाए रखते हैं और नागरिक तथा राज्य के बीच स्थायी संबंध को सुदृढ़ करते हैं।
बिरला ने कहा कि 28वें सीएसपीओसी ने सीएसपीओसी की विरासत को नई ऊर्जा और सार्थकता के साथ आगे बढ़ाया है। उन्होंने कहा कि यह व्यापक और समावेशी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करेगा कि नई दिल्ली सम्मेलन को राष्ट्रमंडल संसदीय सहयोग के इतिहास में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में स्मरण किया जाए। उन्होंने कहा कि चर्चाओं से यह स्पष्ट हुआ कि संसदों को अधिक जन-केंद्रित, जवाबदेह और प्रभावी बनाने पर सामूहिक चिंतन के लिए सीएसपीओसी एक अद्वितीय मंच के रूप में आज भी प्रासंगिक है।
सम्मेलन के सत्रों पर चर्चा करते हुए बिरला ने कहा कि संसदों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जिम्मेदार उपयोग, सोशल मीडिया के प्रभाव, चुनावों से परे नागरिक सहभागिता तथा सांसदों और संसदीय कर्मचारियों के स्वास्थ्य एवं कल्याण जैसे विषयों पर हुई चर्चाएँ विशेष रूप से विचारोत्तेजक रहीं।
पीठासीन अधिकारी समकालीन आवश्यकताओं के अनुरूप लोकतांत्रिक संस्थाओं को ढालें : लोक सभा अध्यक्ष
इससे पहले विशेष पूर्णाधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए बिरला ने कहा कि आधुनिक लोकतंत्र अभूतपूर्व अवसरों के साथ-साथ जटिल, बहुआयामी चुनौतियों का भी सामना कर रहे हैं। उन्होंने जोर दिया कि पीठासीन अधिकारियों का प्रमुख दायित्व है कि वे समकालीन आवश्यकताओं के अनुरूप लोकतांत्रिक संस्थाओं को निरंतर अनुकूलित करें और संवैधानिक मूल्यों में दृढ़ता से निहित रहें।
उन्होंने कहा कि संसदों की वास्तविक प्रासंगिकता नागरिकों की अपेक्षाओं और आकांक्षाओं के प्रति उनकी प्रतिक्रिया-क्षमता में निहित है, ताकि बहसें और विमर्श जन-समस्याओं के सार्थक समाधान तक पहुँचें। उनके अनुसार, व्यापक और गहन चर्चा सीधे तौर पर अधिक पारदर्शिता, जवाबदेही और विधायिकाओं में सार्वजनिक विश्वास के सुदृढ़ीकरण में योगदान देती है।
बिरला ने कहा कि सहमति और असहमति-दोनों ही लोकतंत्र की शक्तियाँ हैं, किंतु इन्हें संसदीय मर्यादा के ढाँचे के भीतर व्यक्त किया जाना चाहिए। इस संदर्भ में, उन्होंने सदन की गरिमा की रक्षा, निष्पक्षता सुनिश्चित करने और संस्थागत विश्वसनीयता को मजबूत करने में पीठासीन अधिकारी की भूमिका को निर्णायक बताया।
उन्होंने बल दिया कि संसदें जनता की हैं और समाज के सभी वर्गों; सामाजिक पदानुक्रम में अंतिम व्यक्ति सहित की आवाज़ के लिए स्थान उपलब्ध कराना चाहिए। उन्होंने कहा कि बहसों में सदस्यों की व्यापक भागीदारी सुनिश्चित करना, सदन के समय का संतुलित उपयोग और सभी पक्षों को समान अवसर देना, पीठ की अनिवार्य जिम्मेदारियाँ हैं।
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / अनूप शर्मा

