सूखे में भी लहलहाई नई विकसित मोठ, 35 दिनों तक बिना बारिश के हुआ बंपर फली विकास

WhatsApp Channel Join Now
सूखे में भी लहलहाई नई विकसित मोठ, 35 दिनों तक बिना बारिश के हुआ बंपर फली विकास


नई दिल्ली, 13 सितंबर (हि.स.)। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (काजरी), जोधपुर द्वारा विकसित मोठ की नई किस्मों ने मौजूदा अल नीनो वर्ष (खरीफ 2026) के दौरान 35 दिनों के लंबे सूखे (ड्राय स्पेल) को झेलकर अद्वितीय सहनशीलता का प्रदर्शन किया है। पश्चिमी राजस्थान के शुष्क इलाकों में लगभग सवा महीने तक बारिश न होने के बावजूद इन किस्मों ने न केवल अपनी हरियाली और वानस्पतिक वृद्धि बनाए रखी बल्कि उनमें भरपूर फलियां भी विकसित हुईं।

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के मुताबिक, पश्चिमी राजस्थान के गर्म शुष्क क्षेत्रों में लगभग 10 लाख हेक्टेयर में मोठ की खेती की जाती है लेकिन 150 से 250 मिमी की अनिश्चित बारिश और 20 से 30 दिनों के लंबे सूखे के कारण इसकी उत्पादकता औसतन 350 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर ही रह जाती है। इस चुनौती से निपटने के लिए संस्थान ने पिछले तीन वर्षों के दौरान चार उन्नत किस्म जैसे काजरी मोठ-4, काजरी मोठ-5, काजरी मोठ-6 और काजरी मोठ-7 जारी की हैं, जिन्होंने इस खरीफ सत्र में कठिन परिस्थितियों में भी उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है।

काजरी के मुताबिक, 10 जुलाई से 2 सितंबर के बीच फसल विकास के दौरान 3 अगस्त को 86 मिमी की अंतिम महत्वपूर्ण बारिश के बाद 7 सितंबर तक लगभग 35 दिनों तक कोई बारिश नहीं हुई। इस दौरान वाष्पीकरण की दर 180 मिमी तक पहुंच गई और सतह की मिट्टी में नमी घटकर मात्र 5 से 6 प्रतिशत रह गई। इसके बावजूद 10 से 40 सेमी की निचली परत में मौजूद 16 प्रतिशत नमी का कुशल उपयोग करते हुए इन किस्मों ने बुवाई के 55 दिनों बाद भी शानदार फली विकास बनाए रखा।

काजरी के मुताबिक, इन किस्मों की प्रमुख विशेषता इनकी विकासात्मक अनुकूलन क्षमता (डेवलपमेंटल प्लास्टिसिटी) है। ये किस्में बुवाई के लगभग 30 दिनों बाद ही फूलने लगती हैं और नमी की उपलब्धता के अनुसार अपने विकास और पकने की अवधि को ढाल लेती हैं। समय पर बुवाई (45 × 10 सेमी दूरी), बुवाई के 20 दिन बाद नमी संरक्षण के लिए निराई-गुड़ाई और खरपतवार प्रबंधन जैसी तकनीकों ने कम उर्वरता वाली रेतीली मिट्टी में भी इस फसल को मजबूती दी।

वर्तमान में काजरी अनुसंधान फार्म में सात हेक्टेयर क्षेत्र में इन किस्मों का बीज उत्पादन किया जा रहा है, ताकि 'साथी पोर्टल' के माध्यम से 2026 के लिए मांग किए गए 23.32 क्विंटल प्रजनक (ब्रीडर) बीज की आवश्यकता को पूरा किया जा सके। राजस्थान राज्य बीज निगम, राष्ट्रीय बीज निगम और निजी कंपनियों द्वारा इसका प्रमाणित बीज तैयार किया जा रहा है। एक क्विंटल प्रजनक बीज से 1,000 से 1,400 क्विंटल प्रमाणित बीज बनता है, जिससे लगभग 10,000 हेक्टेयर क्षेत्र में बुवाई हो सकती है। यदि इन किस्मों का दायरा बढ़ा तो यह राजस्थान के कुल मोठ रकबे का 25 प्रतिशत हिस्सा कवर कर सकती हैं।

कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (डेयर) के सचिव तथा आईसीएआर के महानिदेशक डॉ. एम.एल. जाट ने कहा कि काजरी की मोठ किस्में थार रेगिस्तान को अधिक समृद्ध बनाने और 2047 तक किसानों को आत्मनिर्भर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

उन्होंने कहा कि लंबे समय तक बारिश न होने के बावजूद फसल की वृद्धि और फली विकास बनाए रखने की यह क्षमता जलवायु-अनुकूल कृषि में आनुवंशिक सुधार की शक्ति को दर्शाती है। उचित प्रबंधन, सही समय पर बुवाई और नमी संरक्षण के साथ ये किस्में सूखे के संकट में भी किसानों को सुरक्षित पैदावार देने में पूरी तरह सक्षम हैं।

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / प्रशांत शेखर

Share this story