छत्तीसगढ़ के जिला राजनांदगांव में 'मिशन जल रक्षा' से 2.04 मीटर भूजल स्तर की वृद्धि

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छत्तीसगढ़ के जिला राजनांदगांव में 'मिशन जल रक्षा' से 2.04 मीटर भूजल स्तर की वृद्धि


नई दिल्ली, 26 जुलाई (हि.स.)। मानसून के आगमन के साथ ही देशभर में जल संरक्षण को लेकर चलाए जा रहे राष्ट्रव्यापी ‘कैच द रैन’ अभियान को नई गति मिली है। जल सुरक्षा को सुदृढ़ करने और जल स्रोतों की स्थिरता बढ़ाने के उद्देश्य से विभिन्न राज्यों के जिले वर्षा जल संचयन और भूजल पुनर्भरण के कार्यों में जुटे हैं। इस दिशा में छत्तीसगढ़ का राजनांदगांव जिला अपनी अभिनव पहल ‘मिशन जल रक्षा’ के कारण देशभर में एक प्रेरक उदाहरण बनकर उभरा है।

जल शक्ति मंत्रालय के अनुसार, ‘मिशन जल रक्षा’ के प्रभाव से राजनांदगांव जिले में भूजल स्तर में औसतन 2.04 मीटर की वृद्धि दर्ज की गई है। इससे पूरे जिले में सिंचाई सुविधाएं बेहतर हुई हैं और पेयजल सुरक्षा भी मजबूत हुई है। मंत्रालय का कहना है कि यह पहल वैज्ञानिक योजना, आधुनिक तकनीक और जनभागीदारी के प्रभावी समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण है।

जिला प्रशासन ने मानसून शुरू होने से पहले ही व्यापक तैयारी पूरी कर ली थी। भूजल पुनर्भरण के लिए सबसे उपयुक्त स्थानों की पहचान करने के लिए जीआईएस मैपिंग, रिमोट सेंसिंग, डिजिटल एलिवेशन मॉडल (डीईएम) तथा ‘रिज-टू-वैली’ प्लानिंग जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया गया। इन वैज्ञानिक उपायों के आधार पर ऐसी रणनीति तैयार की गई, जिससे वर्षा की प्रत्येक बूंद का अधिकतम संरक्षण सुनिश्चित किया जा सके।

वैज्ञानिक योजना को धरातल पर उतारने के लिए प्रशासन ने कई नवाचार किए। लंबे समय से बंद पड़े और अनुपयोगी बोरवेलों को ‘रिचार्ज शाफ्ट’ में परिवर्तित किया गया। वहीं, कठोर चट्टानी क्षेत्रों में पानी को गहराई तक पहुंचाने के लिए मिनी परकोलेशन टैंकों को गहरे इंजेक्शन कुओं के साथ जोड़ा गया। इन उपायों से भूजल पुनर्भरण की क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।

मंत्रालय के अनुसार, ‘मिशन जल रक्षा’ की सबसे बड़ी ताकत इसकी व्यापक जनभागीदारी रही है। किसान, महिलाएं, युवा और ग्राम पंचायतें जल संरक्षण एवं जागरूकता अभियानों से सीधे जुड़े। इसके साथ ही कृषि क्षेत्र में भूजल पर बढ़ते दबाव को कम करने के लिए फसल विविधीकरण को भी प्रोत्साहित किया गया।

जिले में लगभग 70 प्रतिशत ग्रीष्मकालीन धान की खेती को कम जल खपत वाली वैकल्पिक फसलों की ओर स्थानांतरित किया गया, जिससे कृषि क्षेत्र में जल की खपत कम हुई और जल संसाधनों का अधिक टिकाऊ उपयोग संभव हो सका।

राजनांदगांव जिले में अब तक 662 गांवों में 60 हजार से अधिक जल संरक्षण एवं पुनर्भरण संरचनाएं स्थापित की जा चुकी हैं। इसके अलावा 500 से अधिक बंद पड़े बोरवेलों को रिचार्ज शाफ्ट में बदला गया है। इसी प्रकार 1,700 से अधिक मिनी परकोलेशन टैंकों के साथ 600 से अधिक इंजेक्शन कुओं का निर्माण किया गया है।

जिले के 2,500 से अधिक जल निकायों का जियो-टैगिंग भी किया गया है, जिससे उनकी निगरानी और संरक्षण अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सके। इन पहलों के माध्यम से 51 लाख से अधिक व्यक्ति-दिवस का रोजगार भी सृजित हुआ है।

जल शक्ति मंत्रालय का कहना है कि वर्षा जल संचयन केवल मानसून तक सीमित मौसमी गतिविधि नहीं है, बल्कि यह जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने, भूजल संसाधनों के संरक्षण और देश को जल-सुरक्षित बनाने की दीर्घकालिक रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

मंत्रालय के अनुसार, राजनांदगांव का ‘मिशन जल रक्षा’ मॉडल देश के अन्य जिलों के लिए भी प्रेरणास्रोत है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण, प्रशासनिक नवाचार और जनसहभागिता के माध्यम से यह अभियान जल संरक्षण की दिशा में एक प्रभावी और टिकाऊ मॉडल के रूप में उभरकर सामने आया है।--------------

हिन्दुस्थान समाचार / श्रद्धा द्विवेदी

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