‘सेक्युलरवाद और जनगण के बदलते आंकड़े’ पुस्तक का लोकार्पण, पुस्तक जनसांख्यिकीय बदलाव पर उठाती सवाल
नई दिल्ली, 29 सितंबर (हि.स.)। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के समवेत सभागार में मंगलवार को ‘सेक्युलरवाद और जनगण के बदलते आंकड़े’ पुस्तक का लोकार्पण किया गया। कार्यक्रम में विशिष्ट अथिति के तौर पर छत्तीसगढ़ के राज्यपाल रमन डेका, मुख्य वक्ता के तौर पर आरएसएस के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर, अध्यक्ष के तौर पर वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय और पुस्तक के लेखक हरेंद्र प्रताप समेत अन्य गणमान्य जन मौजूद रहे। इस दौरान वक्ताओं ने देश में बदलती जनसांख्यिकी, जनगणना के आंकड़ों, आबादी की वृद्धि और सेक्युलरवाद से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर अपने विचार रखे।
मुख्य वक्ता सुनील आंबेकर ने पुस्तक को शोधपरक बताते हुए कहा कि इसमें बड़ी संख्या में आंकड़ों के आधार पर राष्ट्रीय महत्व के विषय का विश्लेषण किया गया है। उन्होंने कहा कि जनसांख्यिकीय आंकड़े केवल वर्तमान स्थिति को समझने में ही मदद नहीं करते, बल्कि भविष्य की दिशा तय करने में भी महत्वपूर्ण होते हैं। आंबेकर ने असम आंदोलन और 1980 के दशक में पूर्वोत्तर में उठे जनसांख्यिकीय बदलाव के सवालों का उल्लेख किया।
उन्होंने इतिहास में युद्धों और राजनीतिक बदलावों के साथ आबादी के स्वरूप में आए परिवर्तनों का भी जिक्र किया। बंगाल विभाजन और 1947 के विभाजन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जनसंख्या और धार्मिक आधार से जुड़े सवालों का देश के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रहा है। उन्होंने देश की सांस्कृतिक पहचान के संदर्भ में जनसांख्यिकी के अध्ययन को महत्वपूर्ण बताते हुए एनआरसी और सीएए का भी उल्लेख किया।
छत्तीसगढ़ के राज्यपाल रमन डेका ने पुस्तक के लेखक को बधाई देते हुए कहा कि जनगणना के आंकड़ों के आधार पर जनसांख्यिकी में हुए बदलावों को समझने की कोशिश की गई है। उन्होंने कहा कि 1970 के दशक के बाद इस विषय पर देश में गंभीर चर्चा शुरू हुई। उन्होंने असम आंदोलन का उल्लेख करते हुए कहा कि पूर्वोत्तर में जनसांख्यिकीय बदलाव को लेकर लंबे समय से चिंता व्यक्त की जाती रही है। डेका ने वैश्वीकरण के दौर में आबादी की आवाजाही और वर्किंग परमिट जैसे मुद्दों पर भी ध्यान देने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि सरकारी कल्याणकारी योजनाएं भी आबादी के आंकड़ों को ध्यान में रखकर तैयार की जाती हैं।
वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय ने कहा कि पुस्तक जनसंख्या के आंकड़ों के माध्यम से एक बड़े सभ्यतागत सवाल को सामने रखती है। उन्होंने कहा कि सेक्युलरवाद की अवधारणा और उसके व्यवहार पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। उन्होंने अयोध्या आंदोलन के दौरान लालकृष्ण आडवाणी द्वारा इस्तेमाल किए गए ‘छद्म सेक्युलरवाद’ शब्द का उल्लेख किया।
रामबहादुर राय ने कहा कि यह विषय केवल जनसंख्या का नहीं, बल्कि सभ्यता और देश के भविष्य से जुड़ा सवाल है। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे को राजनीतिक या वैचारिक दावों के बजाय तथ्यों और आंकड़ों के आधार पर समझने की जरूरत है। उन्होंने एक उच्चस्तरीय समिति का भी उल्लेख किया और कहा कि राज्यों को करीब 35 सवाल भेजे गए हैं। उनके अनुसार पुस्तक में मौजूद तथ्य और आंकड़े इस विषय पर आगे की चर्चा के लिए आधार उपलब्ध कराते हैं।
पुस्तक के लेखक हरेंद्र प्रताप ने कहा कि पुस्तक में जिलावार आंकड़ों के माध्यम से देश में हुए जनसांख्यिकीय बदलावों को सामने रखने का प्रयास किया गया है। उन्होंने कहा कि आजादी के बाद हिंदू आबादी देश में अल्पमत में नहीं थी, लेकिन कई क्षेत्रों में जनसंख्या का स्वरूप बदला है। उन्होंने असम और पूर्वोत्तर के अलावा संथाल परगना और कटिहार जैसे क्षेत्रों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन इलाकों में भी जनसंख्या से जुड़े बदलावों को आंकड़ों के आधार पर समझने की जरूरत है।
हरेंद्र प्रताप ने केंद्र सरकार से 1961 के बाद के धार्मिक जनसांख्यिकी से जुड़े आंकड़े उपलब्ध कराने की मांग की। उन्होंने असम में भाषाई और धार्मिक जनसंख्या में बदलाव, ईसाई मिशनरी गतिविधियों और बंगाल से हिंदुओं के पलायन का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पुस्तक में इन विषयों से जुड़े आंकड़े दिए गए हैं और इन पर व्यापक चर्चा होनी चाहिए। उन्होंने उम्मीद जताई कि पुस्तक राष्ट्रीय स्तर पर एक महत्वपूर्ण दस्तावेज के रूप में देखी जाएगी।
डॉ. जितेंद्र बजाज ने कहा कि पुस्तक के जरिए देश की जनसंख्या से जुड़े ऐतिहासिक आंकड़ों को समझने का प्रयास किया गया है। उन्होंने 1901 संपूर्ण भारत की जनगणना का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय भारत में मुस्लिम आबादी करीब 20 प्रतिशत थी। उन्होंने विभिन्न समुदायों की प्रजनन दर में अंतर और आने वाले दशकों में इसके संभावित जनसांख्यिकीय प्रभाव की चर्चा की। बजाज ने कहा कि हिंदुओं की प्रजनन दर में गिरावट आई है और जनसंख्या के भविष्य को समझने के लिए जन्म तथा मृत्यु से जुड़े आंकड़ों का व्यवस्थित रिकॉर्ड रखा जाना चाहिए।
कार्यक्रम के अंत में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के निदेशक अनिल कुमार ने धन्यवाद ज्ञापन किया।
हिन्दुस्थान समाचार / सौरव राय

