लोकसभा चुनाव : अल्पसंख्यक बहुल उलुबेरिया में तृणमूल का रहा है दबदबा, चौंका सकती है भाजपा

कोलकाता, 4 अप्रैल (हि.स.)। पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले में लोकसभा की कई सीटों पर लड़ाई दिलचस्प है। यहां की एक सीट है उलुबेरिया जिस पर तृणमूल कांग्रेस का कब्जा है। खासतौर पर यह सीट अल्पसंख्यक बहुल है और हिंदी भाषी मतदाता भी यहां बड़ी संख्या में हैं।

इस बार तृणमूल कांग्रेस ने यहां से मौजूदा सांसद सजदा अहमद को दोबारा टिकट दिया है। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में उनके पति सुल्तान अहमद इस सीट पर जीते थे। दिल का दौरा पड़ने से चार सितंबर 2017 को उनका निधन हो गया था। इसके बाद हुए उप चुनाव में सजदा अहमद जीती थीं और उसके बाद 2019 में भी उन्होंने ही जीत दर्ज की थी। भाजपा ने इस सीट पर उदय अरुनपाल चौधरी को उम्मीदवार बनाया है जो साफ सुथरी छवि के नेता हैं। वह सामाजिक कार्यकर्ता रहे हैं और लंबे समय से पार्टी से जुड़े हैं। हालांकि उनका जनाधार बहुत बड़ा नहीं है। वामदलों अथवा कांग्रेस की ओर से फिलहाल उम्मीदवार का ऐलान नहीं किया गया है।

उलुबेरिया पश्चिम बंगाल का महत्वपूर्ण संसदीय क्षेत्र है। उलबेरिया संसदीय क्षेत्र हावड़ा जिले में आता है। वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक यहां की आबादी 20 लाख 51 हजार 790 है। यहां की आबादी में 69.55 फीसदी शहरी और 30.45 पर्सेंट ग्रामीण लोग हैं। यहां अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की आबादी का प्रतिशत क्रमश: 19.63 और 0.15 फीसदी है। वर्ष 2017 की वोटर लिस्ट के मुताबिक यहां वोटर्स की संख्या 15 लाख 40 हजार 916 है। यहां की आधिकारिक भाषा बांग्ला है। अंग्रेजी और उर्दू भी बोली जाती है। यह ऐसा संसदीय क्षेत्र है जिस पर कम्युनिस्टों ने बहुत पहले ही धमक दे दी थी। वर्ष 1957 के चुनाव में यहां से फॉरवर्ड ब्लॉक ने अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी थी, जबकि पूरे देश में कांग्रेस जीत रही थी।

वर्ष 1952 में यहां से इंडियन नेशनल कांग्रेस के सत्यबान राय विजयी हुए थे। वर्ष 1957 में फॉरवर्ड ब्लॉक (एम) के एमके अरबिंदा घोषाल विजयी हुए। वर्ष 1962 में इंडियन नेशनल कांग्रेस ने फिर इस सीट पर कब्जा कर लिया और पुनेंदु खान यहां से सांसद चुने गए। वर्ष 1967 में इंडियन नेशनल कांग्रेस के जेके मंडल को सफलता मिली लेकिन 1971 आते-आते सीपीएम ने यहां पर अपनी पकड़ मजबूत बना ली थी।

वर्ष 1971 में यहां से सीपीएम के प्रसाद भट्टाचार्य चुनाव जीते थे। वर्ष 1977 में श्यामा प्रसन्ना भट्टाचार्य को सफलता मिली थी। 1980 में भी सीपीएम के हन्नान मोल्लाह को यहां से सफलता मिली और 1984, 1989, 1991, 1996, 1998, 1999, 2000 और 2004 तक सीपीएम के हन्नान मोल्लाह ने इस सीट पर कब्जा बनाए रखा था। वर्ष 1999 में ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस मुकाबले में आ गई और वर्ष 2004 में भी ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस दूसरे नंबर पर थी। वर्ष 2009 में बाजी पलट गई और ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस के सुल्तान अहमद ने बाजी मार ली और फिर लगातार यहां से सांसद चुने जाते रहे।

क्या है 2019 का जनादेश-

वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में इस सीट पर 10 उम्मीदवार चुनाव मैदान में थे। भाजपा ने जॉय बनर्जी को, माकपा ने मकसूदा खातून को, तृणमूल कांग्रेस ने सजदा अहमद को, कांग्रेस ने शोमा रानीश्री रॉय को, राष्ट्रीय जनाधिकार सुरक्षा पार्टी ने अलीमुद्दीन नजीर को, सोशलिस्ट यूनिटी सेंटर ऑफ इंडिया (कम्युनिस्ट) ने मिनाती सरकार को और इंडियन यूनिटी सेंटर ने सिमल सरेन को टिकट दिया था। इसके अलावा तीन प्रत्याशी निर्दलीय चुनाव लड़ रहे थे। लोकसभा चुनाव में इस सीट से तृणमूल के सजदा अहमद ने जीत दर्ज की, उन्हें छह लाख 94 हजार 945 वोट मिले थे। जबकि भाजपा के जॉय बनर्जी चार लाख 79 हजार 586 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर रहीं और माकपा के मकसुदा खातून 81 हजार 314 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे थे।

हिन्दुस्थान समाचार/ओम प्रकाश/पवन

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