सहमति की आयु 18 वर्ष ही रखने की सिफारिश, विशेषज्ञों ने भारतीय नैतिक मूल्यों और पारिवारिक व्यवस्था को मजबूत करने पर दिया जोर
नई दिल्ली, 30 जुलाई (हि.स.)। किशोरों के सहमति आधारित संबंधों पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में न्यायपालिका, चिकित्सा, मनोविज्ञान, शिक्षा और विधि क्षेत्र के विशेषज्ञों ने सहमति की आयु 18 वर्ष बनाए रखने की सिफारिश की। विशेषज्ञों ने कहा कि सहमति की आयु कम करने के बजाय परिवार संस्था, भारतीय नैतिक मूल्यों, मूल्य आधारित शिक्षा, परामर्श व्यवस्था और मौजूदा कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन को मजबूत किया जाना चाहिए। संगोष्ठी की सिफारिशों को नीति दस्तावेज के रूप में केंद्र सरकार, सांसदों, विधि आयोग और अन्य संबंधित संस्थानों को भेजा जाएगा।
संस्कृतिक गौरव संस्थान की ओर से गुरुवार को यहां कॉन्स्टीट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया के उपसभापति सभागार में ‘किशोरों के सहमति आधारित संबंध : चिकित्सा, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक एवं कानूनी परिप्रेक्ष्य’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया।
संगोष्ठी में उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति विनीत सरन, उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता आलोक कुमार, इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन बिहेवियर एंड एलाइड साइंसेज (आईएचबीएएस) के निदेशक प्रो. डॉ. राजेंद्र के. धमीजा, आध्यात्मिक वक्ता साध्वी प्रज्ञा भारती तथा शिक्षाविद् डॉ. सुरेंद्र जैन ने अपने विचार रखे। कार्यक्रम की अध्यक्षता संस्कृतिक गौरव संस्थान के अध्यक्ष कपिल खन्ना ने की, जबकि संचालन धर्मशास्त्र राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, जबलपुर के प्रोफेसर डॉ. अनिमेष झा ने किया।
पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति विनीत सरन ने कहा कि कानून का उद्देश्य नाबालिगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। अदालतें प्रत्येक मामले के तथ्यों के आधार पर संवेदनशील दृष्टिकोण अपना सकती हैं, लेकिन व्यापक जनहित में सहमति की वैधानिक आयु 18 वर्ष ही बनी रहनी चाहिए।
वरिष्ठ अधिवक्ता आलोक कुमार ने कहा कि यदि सहमति की आयु कम की जाती है तो बच्चों को उपलब्ध कानूनी सुरक्षा कमजोर पड़ सकती है। बाल संरक्षण कानूनों का क्रियान्वयन संवेदनशील और संतुलित तरीके से होना चाहिए ताकि कमजोर वर्ग के किशोरों को पूरा संरक्षण मिल सके।
आईएचबीएएस के निदेशक प्रो. डॉ. राजेंद्र के. धमीजा ने कहा कि वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि किशोरों का भावनात्मक, मानसिक और तंत्रिका तंत्र का विकास वयस्क होने तक जारी रहता है। सहमति की आयु घटाने की बजाय मानसिक स्वास्थ्य सहायता, परामर्श और पारिवारिक मार्गदर्शन अधिक प्रभावी उपाय हैं।
साध्वी प्रज्ञा भारती ने कहा कि भारतीय संस्कृति में चरित्र, आत्मसंयम और पारिवारिक मूल्यों को स्वस्थ समाज की आधारशिला माना गया है। उन्होंने नैतिक शिक्षा, आध्यात्मिक जागरूकता और संबंधों के प्रति सम्मान की भावना को बच्चों के पालन-पोषण का अभिन्न हिस्सा बनाने की आवश्यकता बताई।
शिक्षाविद् डॉ. सुरेंद्र जैन ने कहा कि जिम्मेदार नागरिक तैयार करने में विद्यालयों और शिक्षण संस्थानों की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने विद्यालयों और महाविद्यालयों के पाठ्यक्रम में मूल्य आधारित शिक्षा, जीवन कौशल, भावनात्मक बुद्धिमत्ता और नैतिक आचरण को शामिल करने की सिफारिश की।
संगोष्ठी में इस बात पर भी जोर दिया गया कि केवल कानून बनाकर किशोरों से जुड़े सामाजिक मुद्दों का समाधान संभव नहीं है। विशेषज्ञों ने भारतीय पारिवारिक व्यवस्था को मजबूत करने, माता-पिता और बच्चों के बीच संवाद बढ़ाने, किशोर परामर्श सेवाओं का विस्तार करने, मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता, डिजिटल साक्षरता तथा भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों पर आधारित शिक्षा को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई।
कपिल खन्ना ने कहा कि भारत की सभ्यता अधिकारों और कर्तव्यों के संतुलन की शिक्षा देती है। उन्होंने कहा कि किशोरों की सुरक्षा केवल सरकार की नहीं, बल्कि परिवार, शिक्षण संस्थानों, नीति निर्माताओं और पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि 18 वर्ष की सहमति आयु को बनाए रखते हुए भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और पारिवारिक मार्गदर्शन को सुदृढ़ करना देश के युवाओं के समग्र विकास और सुरक्षा के लिए आवश्यक है।
संगोष्ठी में प्रमुख सिफारिशों में सहमति की आयु 18 वर्ष बनाए रखना, बाल संरक्षण कानूनों का निष्पक्ष एवं संवेदनशील क्रियान्वयन, भारतीय नैतिक मूल्यों और परिवार संस्था को सशक्त करना, विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में मूल्य आधारित शिक्षा को अनिवार्य बनाना, माता-पिता और किशोरों के बीच संवाद बढ़ाना, परामर्श एवं मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार करना, डिजिटल सुरक्षा और सामाजिक मीडिया के जिम्मेदार उपयोग पर विशेष ध्यान देना तथा जिम्मेदार व्यवहार और नैतिक निर्णय क्षमता को बढ़ावा देने के लिए जन-जागरूकता अभियान चलाना शामिल है।
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हिन्दुस्थान समाचार / माधवी त्रिपाठी

