आखिर क्यों इतनी पतली हैं बनारस की गलियां? शहर के इतिहास में छिपा है जवाब
बनारस यानी वाराणसी का नाम आते ही गंगा घाट, बाबा विश्वनाथ, बनारसी साड़ी, पान और यहां की मशहूर गलियां याद आने लगती हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर बनारस की गलियां इतनी पतली और टेढ़ी-मेढ़ी क्यों हैं? यहां कई जगहों पर दो लोगों के निकलने भर की जगह ही दिखती है और पुराने मकान एक-दूसरे से इतने जुड़े हुए नजर आते हैं कि लगता है जैसे इन्हें एक साथ ही बनाया गया हो।दरअसल, बनारस की इन संकरी गलियों के पीछे कोई एक वजह नहीं है। शहर की पुरानी बसावट, जगह की कमी और यहां के मौसम ने मिलकर बनारस की गलियों को इतना पतला बना दिया है। आज हम आपको अपने इस लेख में इसका दिलचस्प किस्सा बताने जा रहे हैं। आइए जानते हैं-
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बनारस में इतनी संकरी गलियां क्यों हैं?
आपको बता दें कि बनारस दुनिया के पुराने बसे हुए शहरों में से एक है। यह शहर महादेव की प्रिय नगरी भी कहलाती है। बताया जाता है कि पुराने समय में शहर एक सीमित जगह में ही बसा था। जैसे-जैसे यहां लोगों की संख्या बढ़ती गई, उसी जगह के आसपास घर बनते चले गए। जगह ज्यादा नहीं थी, इसलिए मकान दूर-दूर बनाने के बजाय एक-दूसरे के पास ही बनाए गए।
धीरे-धीरे इनके बीच आने जाने वाले रास्ते भी छोटे हो गए। यही रास्ते आगे चलकर बनारस की मशहूर गलियों के रूप में पहचाने जाने लगे। ऐसा कहा जाता है कि बनारस की बस्तियों का विस्तार करीब 14वीं से 18वीं सदी के बीच हुआ था।
जगह कम थी, इसलिए गलियां भी छोटी रहीं
ऐसा कहा जाता है कि पुराने बनारस में शहर को बड़ा करने के लिए ज्यादा जगह नहीं थी, इसलिए लोगों ने जहां जैसी जगह मिली, वहीं अपने घर और मोहल्ले बना लिए। मकान इतने पास-पास बने कि बीच में सिर्फ पतली-पतली गलियां ही बच पाईं। इसी चक्कर में आज भी वहां एक-दूसरे से सटे हुए मकान और पत्थरों वाली संकरी गलियां दिखाई देती हैं। यह आपको देखने में भले लगे कि यहां चलना कितना मुश्किल होता होगा, लेकिन सच तो यह है कि यही तंग गलियां बनारस का असली मजा देती हैं।
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गर्मी से बचने में भी मदद करती हैं संकरी गलियां
यह भी कहा जाता है कि बनारस की पतली गलियां सिर्फ जगह कम होने की वजह से नहीं बनी थीं बल्कि इसके पीछे एक जबरदस्त देसी जुगाड़ भी था और वो है गर्मी से बचने का। यहां के ऊंचे और पास-पास बने घरों की वजह से तेज धूप सीधे जमीन या घरों के अंदर नहीं आ पाती है। इससे होता यह है कि मई-जून की तपती गर्मी में भी इन संकरी गलियों और मकानों में थोड़ी ठंडक बनी रहती है। यानी पुराने जमाने के लोगों ने बिना AC के ही गर्मी से निपटने का कूल आईडिया निकाल लिया था।
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गंगा किनारे बसता गया शहर
बनारस का पुरानी बस्ती गंगा नदी के किनारे बसती चली गई। जैसे-जैसे बाहर से आकर लोग यहां बसते गए, नए मोहल्ले और गलियां अपने आप बनती चली गईं। खास बात तो यह है कि इन गलियों के नाम भी वही पड़ गए जैसा वहां का माहौल था या जैसे लोग वहां रहते थे। जैसे 'बंगाली टोला'- जहां बंगाल से आकर लोग बसे थे। ऐसे ही अलग-अलग जगहों से आए लोगों ने अपने-अपने इलाके बसा लिए। बनारस की ये गलियां लोगों की अपनी एक हिस्ट्री और कहानी बताती हैं।
गलियों के नाम भी हैं खास
यहां आपको खोवा गली, कचौड़ी गली, पत्थर गली, नेपाली गली और तुलसी गली जैसे नाम सुनने को मिल जाएंगे।
कई गलियों के नाम वहां मिलने वाली फेमस चीजों, बिजनेस या किसी ऐतिहासिक जगह की वजह से पड़े हैं।
यानी बनारस की गलियों को समझना है तो आपको शहर की असली हिस्ट्री भी जाननी होगी।
बनारस की गलियां इतनी खास क्यों हैं?
बनारस की ये गलियां ही आज भी शहर की असली पहचान हैं। इन्हीं पतले रास्तों से होकर लोग पुराने मोहल्लों, मशहूर मंदिरों और सीधे गंगा घाटों तक पहुंचते हैं। खास बात तो यह है कि बनारस के जबरदस्त स्ट्रीट फूड का असली मजा भी इन्हीं गलियों में मिलता है। कचौड़ी-जलेबी हो, गाढ़ी लस्सी या फिर बनारसी पान ही क्यों न हो, सबकुछ आपको इन्हीं गलियों के नुक्कड़ों पर मिल जाएगा।

