भद्रकाली मंदिर के शिलालेख में सोमनाथ का अमर इतिहास
सोमनाथ (गुजरात), 11 जनवरी (हि.स.)। प्रभास पाटन की पवित्र धरती अनेक ऐतिहासिक धरोहरों को संजोए हुए है। यहां मिले ताम्रपत्र, अभिलेख और शिलालेख इस क्षेत्र के गौरवशाली और स्वर्णिम अतीत की गवाही देते हैं। आज भी वीरता की कहानियां सुनाने वाले पाळिया इस भूमि के पराक्रम के प्रमाण हैं। प्रभास पाटन और सोमनाथ मंदिर के इतिहास से जुड़े कई प्रमाण यहां अलग-अलग स्थानों पर मिलते हैं। सोमनाथ और प्रभास क्षेत्र के शिलालेख और ताम्रपत्र प्रभास पाटन संग्रहालय में सुरक्षित रखे गए हैं। अनेक आक्रमणों में नष्ट हुए मंदिरों के अवशेष भी वहां सुरक्षित हैं। यह संग्रहालय वर्तमान में प्राचीन सूर्य मंदिर में संचालित हो रहा है। ऐसा ही एक ऐतिहासिक शिलालेख संग्रहालय के पास, पुराने राम मंदिर के निकट भद्रकाली फळिया में स्थित है।
यह शिलालेख सोमपुरा ब्राह्मण दीपकभाई दवे के घर के आंगन में बने भद्रकाली मंदिर की दीवार पर आज भी लगा हुआ है। संग्रहालय की क्यूरेटर तेजल परमार के अनुसार यह शिलालेख ई.स. 1169 में खुदवाया गया था। इसे राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित किया गया है। यह शिलालेख अणहिलवाड़ पाटन के राजा कुमारपाल के गुरु श्रीमद भावबृहस्पति की प्रशंसा में लिखा गया है।
इस शिलालेख में सोमनाथ मंदिर के पौराणिक और मध्यकालीन इतिहास का वर्णन है। इसमें बताया गया है कि सतयुग में चंद्रदेव ने सोने का मंदिर बनवाया, त्रेतायुग में रावण ने चांदी का मंदिर, द्वापर युग में श्रीकृष्ण ने लकड़ी का मंदिर, और कलियुग में राजा भीमदेव सोलंकी ने पत्थर का भव्य मंदिर बनवाया।
इतिहास से पता चलता है कि भीमदेव सोलंकी ने पुराने मंदिर के अवशेषों पर चौथा मंदिर बनवाया था। बाद में कुमारपाल ने उसी स्थान पर पांचवां मंदिर बनवाया। सोलंकी शासनकाल में प्रभास पाटन धार्मिक के साथ-साथ कला, स्थापत्य और साहित्य का भी केंद्र बना। सिद्धराज जयसिंह की न्यायप्रियता और कुमारपाल की धर्मनिष्ठा ने सोमनाथ मंदिर को विशेष गौरव दिलाया। यह आज भी गुजरात के स्वर्णकाल की याद दिलाता है।
प्रभास पाटन की धरती केवल अवशेष ही नहीं, बल्कि सनातन धर्म का गौरव भी अपने भीतर समेटे हुए है। भद्रकाली फळिया का यह शिलालेख आज भी सोलंकी शासकों और विद्वान भावबृहस्पति के समर्पण की याद दिलाता है। यह भूमि अपनी ऐतिहासिक विरासत के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों को हमारे स्वर्णिम अतीत की झलक दिखाती रहेगी। सोमनाथ का अडिग शिखर इस बात का प्रमाण है कि समय चाहे कितना भी बदल जाए, भक्ति और स्वाभिमान हमेशा अमर रहते हैं।
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हिन्दुस्थान समाचार / यजुवेंद्र दुबे

