नेपाल के सुप्रीम कोर्ट ने प्रचण्ड को दिया बड़ा झटका, जनयुद्ध दिवस मनाने के फैसले को किया रद्द



नेपाल के सुप्रीम कोर्ट ने प्रचण्ड को दिया बड़ा झटका, जनयुद्ध दिवस मनाने के फैसले को किया रद्द


नेपाल के सुप्रीम कोर्ट ने प्रचण्ड को दिया बड़ा झटका, जनयुद्ध दिवस मनाने के फैसले को किया रद्द


नेपाल के सुप्रीम कोर्ट ने प्रचण्ड को दिया बड़ा झटका, जनयुद्ध दिवस मनाने के फैसले को किया रद्द


काठमांडू, 29 दिसम्बर (हि.स.)। नेपाल की सुप्रीम कोर्ट ने माओवादी पार्टी और प्रधानमंत्री पुष्पकमल दाहाल प्रचण्ड को एक बड़ा झटका देते हुए जनयुद्ध दिवस मनाने के सरकार के फैसले को रद्द कर दिया है। प्रचण्ड सरकार की तरफ से नेपाल में शुरू किए गए सशस्त्र विद्रोह के दिन को जनयुद्ध दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया गया था।

नेपाल में माओवादी पार्टी जब-जब सत्ता में आती है तब-तब फागुन 1 गते (13/14 फरवरी) को सरकारी स्तर पर ही जनयुद्ध दिवस के रूप में मनाने का फैसला करती है। तीसरी बार प्रधानमंत्री बने प्रचण्ड ने अपनी नीति तथा कार्यक्रम में एक बार फिर से जनयुद्ध दिवस मनाने का फैसला किया था। पिछले साल सरकार के द्वारा किए गए इस फैसले के विरोध में सुप्रीम कोर्ट में एक रिट दायर की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अपना फैसला सुनाते हुए सरकार के फैसले को असंवैधानिक करार दिया। प्रचण्ड सरकार ने पिछले साल को जनयुद्ध दिवस पर सार्वजनिक अवकाश देने का फैसला किया था।

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश आनन्द मोहन भट्टराई तथा महेश शर्मा पौडेल की संयुक्त खण्डपीठ ने जनयुद्ध दिवस मनाने के सरकार के फैसले को संविधान की मर्म और भावना के विपरीत बताया है। अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वृहत शांति समझौता और राजनीतिक दलों के बीच हुए राष्ट्रीय सहमति के विपरीत किसी खास पक्ष या पार्टी के तरफ से इस तरह के सशस्त्र विद्रोह की याद में सरकारी आयोजन करना और सार्वजनिक विदा देना सर्वथा अनुचित है।

दो जजों के खण्डपीठ ने कहा कि नेपाल के संविधान, वृहत शांति समझौता और संक्रमणकालीन न्याय की व्यवस्था के लिए बने प्रावधानों के तहत जनयुद्ध दिवस मनाने के फैसले को किसी भी तरह से न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता है। इसलिए सरकार के इस फैसले को निरस्त किया जाता है। कोर्ट ने यह भी कहा है कि माओवादी सहित नेपाल के प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच हुए राष्ट्रीय सहमति, नेपाल के संविधान, संक्रमणकालीन न्याय व्यवस्था कहीं पर भी माओवादी के सशस्त्र विद्रोह को जनयुद्ध के रूप में उल्लेख नहीं किया गया है इसलिए इसे सरकारी मान्यता नहीं दी जा सकती है।

अदालत का यह फैसला माओवादी पार्टी खासकर इस पार्टी के अध्यक्ष और प्रधानमंत्री प्रचण्ड के लिए एक बड़ा झटका है। खुद के नेतृत्व में रहे सरकार के द्वारा अपनी मौलिक पहचान को सरकारी मान्यता को सुप्रीम कोर्ट के तरफ से रद्द कर देना उनकी नैतिक हार के रूप में देखा जा रहा है। माओवादी पार्टी के उपाध्यक्ष कृष्ण बहादुर महरा ने अदालत के फैसले पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए पार्टी पदाधिकारियों की बैठक के बाद इस पर आधिकारिक प्रतिक्रिया देने की बात कही है।

माओवादी पार्टी की प्रवक्ता पम्फा भूषाल ने कहा कि अदालत का फैसला दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि हम इसके अन्य विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। जल्द ही पार्टी पदाधिकारियों की बैठक में अदालत के फैसले पर चर्चा के बाद आगे कौन सा कदम उठाया जाए इस पर विचार किया जाएगा।

हिन्दुस्थान समाचार / पंकज दास /प्रभात

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