लिपुलेक के रास्ते कैलाश मानसरोवर यात्रा पर नेपाल के दावे को भारत ने फिर किया खारिज

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लिपुलेक के रास्ते कैलाश मानसरोवर यात्रा पर नेपाल के दावे को भारत ने फिर किया खारिज


काठमांडू, 07 मई (हि.स.)। लिपुलेक के रास्ते कैलाश मानसरोवर यात्रा संचालन को लेकर भारतीय विदेश मंत्रालय ने अपने पुराने रुख को दोहराते हुए नेपाल के दावे को खारिज किया है। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि कैलाश मानसरोवर यात्रा का विषय कोई नया मुद्दा नहीं है।

विदेश मंत्रालय की साप्ताहिक मीडिया ब्रीफिंग में उन्होंने कहा, “हम इस विषय पर पहले ही प्रेस नोट जारी कर चुके हैं। मानसरोवर यात्रा साल 1954 से ही होती आ रही है। यह कोई नया विषय नहीं है।”

कुछ दिन पहले भारत और चीन द्वारा लिपुलेक के रास्ते कैलाश मानसरोवर यात्रा संचालन शुरू करने के निर्णय पर नेपाल ने दोनों देशों को कूटनीतिक नोट भेजकर आपत्ति जताई थी। इसके तुरंत बाद भारतीय विदेश मंत्रालय ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि यह पुराना और पहले से जारी विषय है। हालांकि भारत ने नेपाल के साथ इस विषय पर संवाद के लिए तैयार रहने की बात भी कही थी।

सन् 2015 में भारत और चीन के बीच लिपुलेक के रास्ते व्यापार और तीर्थयात्रियों के आवागमन को लेकर समझौता हुआ था। उस समय भी नेपाल ने कूटनीतिक नोट भेजकर विरोध दर्ज कराया था लेकिन भारत और चीन दोनों ने औपचारिक रूप से कोई जवाब नहीं दिया था। इस बार भी चीन की ओर से नेपाल की आपत्ति पर अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।

नेपाल का दावा है कि सन् 1816 में नेपाल और ब्रिटिश भारत के बीच हुई सुगौली संधि के अनुसार महाकाली नदी के पूर्व का भूभाग नेपाल का हिस्सा है। नेपाल के अनुसार लिम्पियाधुरा से निकलने वाली महाकाली नदी ही वास्तविक सीमा नदी है इसलिए लिपुलेक क्षेत्र नेपाल के अधिकार क्षेत्र में आता है।

यह मुद्दा लंबे समय से नेपाल, भारत और चीन के बीच संवेदनशील सीमा विवाद के रूप में देखा जाता रहा है। नेपाल लगातार कहता आया है कि उसकी भूमि का उपयोग कर किसी भी प्रकार की द्विपक्षीय सहमति नेपाल की अनुमति और सहभागिता के बिना नहीं की जानी चाहिए।

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हिन्दुस्थान समाचार / पंकज दास

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