संयुक्त राष्ट्र से बलूचिस्तान की मान्यता की अपील, पाकिस्तान-ईरान पर अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन का आरोप

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न्यूयॉर्क, 05 जनवरी (हि.स.)। फ्री बलोचिस्तान मूवमेंट के प्रतिनिधि मीर यार बलोच ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव, यूएन सदस्य देशों के स्थायी प्रतिनिधियों और मानवाधिकार से जुड़े विशेष निकायों को एक औपचारिक पत्र भेजकर बलूचिस्तान को स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र के रूप में मान्यता देने की मांग की है। पत्र में पाकिस्तान और ईरान पर बलूच क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन के आरोप लगाए गए हैं।

पत्र में कहा गया है कि मार्च 1948 में पाकिस्तान ने सैन्य बल के माध्यम से बलूचिस्तान का विलय किया, जो संयुक्त राष्ट्र चार्टर में निहित सिद्धांतों का उल्लंघन है। प्रतिनिधि के अनुसार, 1947 से पहले बलूचिस्तान की एक अलग संप्रभु पहचान थी और उस समय की विधायी संस्थाओं ने पाकिस्तान में विलय को अस्वीकार कर दिया था। इसके बावजूद सैन्य कार्रवाई कर बलूचिस्तान को पाकिस्तान में शामिल किया गया, जिसे आज तक “ऐतिहासिक अन्याय” बताया गया है।

पत्र में औपनिवेशिक काल की सीमाओं का भी उल्लेख किया गया है। इसमें 1893 की ड्यूरंड रेखा और 1871–72 की गोल्डस्मिड रेखा को कृत्रिम सीमाएं बताया गया है, जिनके कारण बलूच क्षेत्रों का विभाजन हुआ। प्रतिनिधि का दावा है कि इन सीमाओं का निर्धारण स्थानीय लोगों की सहमति के बिना किया गया, जिससे आज भी क्षेत्रीय अस्थिरता और संघर्ष की स्थिति बनी हुई है।

मानवाधिकार के मुद्दे पर पत्र में पाकिस्तान पर जबरन गुमशुदगी, यातना, न्यायेतर हत्याएं और नागरिकों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई जैसे आरोप लगाए गए हैं। साथ ही ईरान पर भी बलूच आबादी के खिलाफ कथित फांसी, दमन और विस्थापन के आरोप लगाए गए हैं। पत्र में इन सभी मामलों की निष्पक्ष और अंतरराष्ट्रीय जांच कराने की मांग की गई है।

आर्थिक पहलू पर मीर यार बलोच ने आरोप लगाया है कि बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों—तेल, गैस, तांबा, सोना और अन्य खनिजों—का दोहन स्थानीय लोगों की सहमति के बिना किया जा रहा है। पत्र के अनुसार, इन संसाधनों से होने वाली आय स्थानीय विकास के बजाय सैन्य और रणनीतिक गतिविधियों में इस्तेमाल की जा रही है।

संयुक्त राष्ट्र से की गई मांगों में बलूचिस्तान में शांति मिशन की तैनाती, कथित कब्जे को अवैध घोषित करने वाला प्रस्ताव पारित करने, बलूचिस्तान को स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता देने, संस्थागत और आर्थिक सहायता प्रदान करने, मानवाधिकार जांच मिशन भेजने और संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता प्रक्रिया शुरू करने जैसी मांगें शामिल हैं।

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हिन्दुस्थान समाचार / आकाश कुमार राय

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