विपरीत धाराओं के मिलन का मौका बनी भारत की अध्यक्षता में हुई ब्रिक्स शिखर बैठक

WhatsApp Channel Join Now
विपरीत धाराओं के मिलन का मौका बनी भारत की अध्यक्षता में हुई ब्रिक्स शिखर बैठक


नई दिल्ली 13 सितंबर (हि.स.) भारत की अगुवाई में 18 वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन दुनिया में चल रहे तमाम टकरावों के परस्पर विरोधी पक्षों के बीच संवाद और कूटनीति की राह चुनने का मौका ले कर आया।

भारत की राजधानी नई दिल्ली में 18 वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में पश्चिम एशिया में संघर्षरत ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के अलावा चीन और फिलीपींस तथा मिस्र और इथियोपिया के शीर्ष नेतृत्व मौजूद थे।

पश्चिम एशिया में जारी भारी तनाव के बीच ब्रिक्स सम्मेलन के इतर ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में अबूधाबी के क्राउन प्रिंस खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के बीच कल रात हुई मुलाकात को वैश्विक स्तर पर बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ईरानी दूतावास ने सोशल मीडिया पर इस द्विपक्षीय मुलाकात की पुष्टि की। पश्चिम एशिया संघर्ष भड़कने के बाद दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच यह पहली बैठक थी। इसके अलावा चीन, फिलीपींस, मिस्र और इथियोपिया के नेताओं के बीच अनौपचारिक बातचीत हुई।

उल्लेखनीय है कि ईरान के राष्ट्रपति और आबू धाबी के क्राउन प्रिंस के बीच यह बैठक उन खबरों के बीच हुई है जब ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य से पारगमन के मुद्दे पर खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के सदस्य देशों और इराक के साथ चर्चा की योजना बना रहा है। दोनों देशों के बीच तनाव का मुख्य कारण फारस की खाड़ी में स्थित तीन रणनीतिक द्वीपों- अबू मूसा, ग्रेटर तुंब और लेसर तुंब पर संप्रभुता का दशकों पुराना विवाद रहा है। इसके अलावा, इजराइल के साथ यूएई के रिश्तों के सामान्यीकरण (अब्राहम समझौता) और यमन के गृहयुद्ध में परस्पर विरोधी गुटों का समर्थन करने को लेकर भी दोनों के बीच क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा बनी हुई है। इस मुलाकात से आशा बंधी है कि होरमुज जलडमरूमध्य और फारस की खाड़ी में शांति और मालवाहक जहाज़ों की सुरक्षित आवाजाही का रास्ता खुलेगा।

कूटनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भारत की कूटनीतिक शैली की सबसे बड़ी ताक़त उसकी बहु-संलग्नता (Multi-alignment) की नीति बनकर उभरी है। रणनीतिक रूप से विरोधी देशों को एक ही मंच पर लाना और उनके बीच संवाद का अनुकूल वातावरण तैयार करना भारतीय विदेश नीति की प्रमुख पहचान बन चुका है। नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान भी यही स्थिति देखने को मिली, जहाँ परस्पर विरोधी हित और तीव्र क्षेत्रीय तनाव वाले कई देशों के शीर्ष नेता एक ही मेज पर आमने-सामने आए।

यह पहली बार नहीं है जब भारत ने वैश्विक तनाव के बीच ऐसा कूटनीतिक मंच तैयार किया हो। इससे पूर्व मार्च 2023 में G20 विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान भी भारत ने रूस-यूक्रेन युद्ध के तीखे वैश्विक तनाव के बावजूद अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन और रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव को एक ही छत के नीचे लाकर अपनी कूटनीतिक तटस्थता और रणनीतिक संतुलन का लोहा मनवाया था।

दक्षिण चीन सागर में जारी क्षेत्रीय तनाव के बीच चीन और फिलीपींस के शीर्ष नेतृत्व की ब्रिक्स मंच पर सह-उपस्थिति ने भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान खींचा। 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में फिलीपींस का प्रतिनिधित्व राष्ट्रपति फर्डिनेंड मार्कोस जूनियर ने किया, जिनके साथ विदेश सचिव मारिया थेरेसा पी. लाज़ारो सहित एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल भारत पहुँचा। फिलीपींस ब्रिक्स का स्थाई सदस्य नहीं है, बल्कि उसने 'आउटरीच देश' के रूप में और आसियान के अध्यक्ष के तौर पर सम्मेलन में शिरकत की।

चीन और फिलीपींस के बीच मुख्य विवाद 'सेकंड थॉमस शोल' और 'स्कारबोरो शोल' जैसे जल क्षेत्रों पर संप्रभुता को लेकर है। चीन अपने 'नाइन-डैश लाइन' मानचित्र के आधार पर लगभग संपूर्ण दक्षिण चीन सागर पर अपना दावा करता है, जबकि फिलीपींस 2016 के अंतरराष्ट्रीय पंचाट के फैसले का हवाला देकर चीन के इस दावे को खारिज करता आया है।

इसी तरह अफ्रीका के दो प्रमुख राष्ट्रों- मिस्र और इथियोपिया के बीच नील नदी के जल बंटवारे पर चल रहे विवाद के बावजूद दोनों देशों के शीर्ष प्रमुखों ने दिल्ली सम्मेलन में हिस्सा लिया। मिस्र के राष्ट्रपति अब्दुल फत्ताह अल-सिसी और इथियोपिया के प्रधानमंत्री डॉ. अबी अहमद अली सम्मेलन में अपनी-अपनी सरकारों का प्रतिनिधित्व करने पहुँचे।

ज्ञात हो कि दोनों देश जनवरी 2024 में ब्रिक्स के पूर्णकालिक सदस्य बने थे। दोनों देशों के बीच टकराव की मुख्य वजह इथियोपिया द्वारा नील नदी पर निर्मित 'ग्रैंड इथियोपियन रेनेसां डैम' (जीईआरडी) है। अपनी जल आवश्यकताओं के लिए 90 प्रतिशत से अधिक नील नदी पर निर्भर मिस्र इसे अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अस्तित्व का संकट मानता है, जबकि इथियोपिया इसे अपने आर्थिक विकास और ऊर्जा क्षेत्र के लिए अनिवार्य बताता है।

इन तमाम जटिल और ऐतिहासिक विवादों के बीच, ब्रिक्स शिखर सम्मेलन और इसके इतर अनौपचारिक बैठकों ने इन सभी विरोधी पक्षों को आपस में मिलने और विचार-विमर्श का एक दुर्लभ अवसर प्रदान किया है। इस सफल आयोजन से भारत ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया है कि वह तीखे वैश्विक मतभेदों के बावजूद 'ग्लोबल साउथ' और दुनिया की उभरती शक्तियों को एक तटस्थ व भरोसेमंद मंच पर लाने में पूरी तरह सक्षम है।

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / सचिन बुधौलिया

Share this story