भारतीय महाकाव्य, विदेशी प्रचार! 'रामायण' के मेकर्स से सवाल

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भारतीय महाकाव्य, विदेशी प्रचार! 'रामायण' के मेकर्स से सवाल


मुंबई, 30 अक्टूबर (हि.स.)। जिस 'रामायण' की जड़ें भारतीय मिट्टी में हैं और जिसकी कहानी देश के करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़ी है, उसी फिल्म को लेकर भारतीय दर्शकों और पत्रकारों से सीधा संवाद प्राथमिकता में नजर नहीं आ रहा।

विदेशी दर्शकों के सामने भारतीय महाकाव्य 'रामायण' फिल्म को भव्य तरीके से पेश करना अच्छी बात है, लेकिन क्या अंतरराष्ट्रीय पहचान की दौड़ में अपने देश के दर्शकों को नजरअंदाज करना सही रणनीति है? आखिर जिस भारतीय दर्शक के भरोसे इस फिल्म की सबसे बड़ी व्यावसायिक उम्मीदें टिकी हैं, उसे फिल्म के कलाकारों और निर्माताओं से बातचीत का पर्याप्त मौका क्यों नहीं मिलना चाहिए? केवल विदेशी मंचों पर भव्य आयोजन करने से भारतीय दर्शकों के बीच फिल्म को लेकर उत्सुकता पैदा नहीं की जा सकती।

भारतीय संस्कृति, आस्था और परंपरा से जुड़ी रामायण को बड़े पर्दे पर पेश करने की तैयारी कर रहे निर्माता नमित मल्होत्रा का पूरा जोर फिल्म को वैश्विक पहचान दिलाने पर दिखाई दे रहा है। नितेश तिवारी के निर्देशन में बनी रणबीर कपूर, साई पल्लवी और यश स्टारर 'रामायण' के प्रचार के लिए विदेशी मंचों को प्राथमिकता दी जा रही है।

27 अक्टूबर को लॉस एंजिल्स के प्रतिष्ठित डेविड गेफेन थिएटर में फिल्म का भव्य प्रीमियर आयोजित किया गया, जहां फिल्म की स्टारकास्ट और निर्देशक के साथ निर्माता भी मौजूद रहे। विदेशी मीडिया और हॉलीवुड हस्तियों के बीच फिल्म का प्रचार तो जोर-शोर से किया गया, लेकिन इस पूरी कवायद में भारतीय मीडिया की भूमिका और उसे मिलने वाले अवसरों को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

रणबीर कपूर, साई पल्लवी और यश जैसे बड़े सितारों से भारतीय मीडिया भी फिल्म की तैयारी, किरदारों की समझ और रामायण जैसे संवेदनशील महाकाव्य को पर्दे पर उतारने की जिम्मेदारी को लेकर सवाल पूछना चाहता है। लेकिन अगर प्रमोशनल गतिविधियों में विदेशी पत्रकारों को प्राथमिकता मिलती है और भारतीय पत्रकारों के लिए पर्याप्त अवसर नहीं रखे जाते, तो यह निश्चित रूप से निराशाजनक है। नमित मल्होत्रा को समझना होगा कि भारतीय मीडिया केवल फिल्म के पोस्टर और प्रचार सामग्री प्रकाशित करने के लिए नहीं है, बल्कि वह दर्शकों और फिल्म निर्माताओं के बीच एक महत्वपूर्ण माध्यम भी है। ऐसे में भारतीय पत्रकारों से दूरी बनाकर वैश्विक पहचान बनाने की कोशिश अधूरी ही मानी जाएगी।

इसके अलावा, चर्चा है कि भारत में फिल्म की विशेष स्क्रीनिंग को लेकर भी अभी कोई स्पष्ट योजना सामने नहीं आई है, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में निर्माताओं को स्पष्ट करना चाहिए कि क्या भारतीय मीडिया और फिल्म जगत के लिए विशेष स्क्रीनिंग आयोजित की जाएगी या नहीं।

आखिर रामायण भारत की सांस्कृतिक विरासत है और इसे सबसे पहले भारतीय दर्शकों के सामने ही अपनी विश्वसनीयता साबित करनी होगी। विदेशी तारीफ और हॉलीवुड का मंच अपनी जगह है, लेकिन भारतीय दर्शकों और मीडिया को पर्याप्त महत्व दिए बिना इस महाकाव्य को वैश्विक पहचान दिलाने की कोशिश कितनी सफल होगी? नमित मल्होत्रा को यह नहीं भूलना चाहिए कि फिल्म की असली परीक्षा भारतीय दर्शकों के बीच ही होनी है।

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हिन्दुस्थान समाचार / लोकेश चंद्र दुबे

Livevns.news Desk
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