काशी का रहस्य: जिस महादेव की पूजा स्वयं विश्वेश्वर करते हैं, उन्हें कहा जाता है ब्रह्मांड का प्रथम शिवलिंग
वाराणसी। काशी में भगवान शिव केवल आराध्य ही नहीं, बल्कि इस नगरी के अधिपति माने जाते हैं। काशी की इसी शिव परंपरा के बीच एक ऐसा प्राचीन शिवलिंग भी विराजमान है, जिसे पौराणिक मान्यताओं में ब्रह्मांड का प्रथम शिवलिंग कहा गया है। ये हैं अविमुक्तेश्वर महादेव। मान्यता है कि स्वयं श्री काशी विश्वनाथ ने अविमुक्तेश्वर शिवलिंग की स्थापना की थी और इसके बाद ही संसार में शिवलिंग स्थापित कर पूजन करने की परंपरा शुरू हुई।
जिन विश्वेश्वर को पूजता है संसार, वे करते हैं अविमुक्तेश्वर की आराधना
अविमुक्तेश्वर महादेव की महिमा का वर्णन स्कंदपुराण के काशी खंड से जोड़ा जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार जिन भगवान विश्वेश्वर की आराधना सारा संसार करता है, वही विश्वेश्वर मुक्ति प्रदान करने वाले अविमुक्तेश्वर की आराधना करते हैं। मान्यता है कि बाबा विश्वनाथ ने स्वयं अविमुक्तेश्वर का दिव्य स्वरूप प्रकट कर शिवलिंग की स्थापना की। इसे ब्रह्मांड में शिवलिंग की पहली स्थापना माना जाता है। इसीलिए अविमुक्तेश्वर को ‘प्रथम महालिंग’ और ‘आदि शिवलिंग’ भी कहा जाता है।
अविमुक्तेश्वर के बाद शुरू हुई शिवलिंग स्थापना की परंपरा
पौराणिक मान्यता के अनुसार अविमुक्तेश्वर की स्थापना से पहले न तो शिवलिंग स्थापित करने की परंपरा थी और न ही देवताओं और मनुष्यों को इसके स्वरूप का ज्ञान था।
भगवान विश्वनाथ ने जब अविमुक्तेश्वर के रूप को प्रकट किया तो इसके बाद ब्रह्मा, विष्णु सहित अन्य देवी-देवताओं और ऋषि-मुनियों ने भी अलग-अलग स्थानों पर शिवलिंग स्थापित कर भगवान शिव की आराधना शुरू की। इस प्रकार अविमुक्तेश्वर को शिवलिंग पूजन की सनातन परंपरा का आदि केंद्र माना गया।
विश्वनाथ धाम के पास खोवा गली में विराजमान हैं अविमुक्तेश्वर
अविमुक्तेश्वर महादेव का यह प्राचीन शिवलिंग आज भी श्री काशी विश्वनाथ धाम क्षेत्र से सटी खोवा गली में विराजमान है। विश्वनाथ धाम पहुंचने वाले बहुत से श्रद्धालु बाबा विश्वनाथ के दर्शन के साथ अविमुक्तेश्वर महादेव का दर्शन-पूजन भी करते हैं। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर माधव जनार्दन रटाटे के अनुसार अविमुक्तेश्वर को ब्रह्मांड का आदि शिवलिंग माना गया है। धार्मिक मान्यता है कि इनके दर्शन और स्पर्श से भक्तों के मनोरथ शीघ्र पूर्ण होते हैं।
अविमुक्त’ काशी की प्राचीन शिव परंपरा के साक्षी
काशी को ‘अविमुक्त क्षेत्र’ भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि भगवान शिव काशी का कभी त्याग नहीं करते। अविमुक्तेश्वर महादेव इसी प्राचीन आध्यात्मिक अवधारणा और काशी की शिव परंपरा के महत्वपूर्ण प्रतीक माने जाते हैं। विश्वनाथ धाम की भव्यता के बीच खोवा गली में विराजमान अविमुक्तेश्वर महादेव आज भी उस पौराणिक मान्यता को जीवंत रखे हुए हैं, जिसके अनुसार यहीं से शिवलिंग की स्थापना और उसके पूजन की सनातन परंपरा आगे बढ़ी।

