काशी के पुष्पदंतेश्वर: फूलों पर पैर पड़ने का दोष भी हर लेते हैं महादेव, सात पीढ़ियों के उद्धार की मान्यता
वाराणसी। शिव की नगरी काशी में विराजमान प्रत्येक शिवलिंग के साथ कोई न कोई पौराणिक कथा और धार्मिक मान्यता जुड़ी है। इन्हीं में पातालेश्वर क्षेत्र स्थित पुष्पदंतेश्वर महादेव का विशेष स्थान है। मान्यता है कि इनके दर्शन और आराधना से जन्म-जन्मांतर के पापों का क्षय होता है। इतना ही नहीं, किसी देवस्थान पर अर्पित फूल, माला, अक्षत या जल पर अनजाने में पैर पड़ने से लगे दोष से मुक्ति के लिए भी पुष्पदंतेश्वर महादेव के दर्शन का विशेष महत्व बताया गया है।
गंधर्वराज पुष्पदंत से जुड़ी है कथा
पुष्पदंतेश्वर महादेव की कथा गंधर्वराज पुष्पदंत से जुड़ी मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गंधर्वराज पुष्पदंत भगवान शिव के परम भक्त थे और उन्हीं से प्रसिद्ध शिव महिम्न स्तोत्र की रचना को जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि एक समय मोहवश उन्होंने पूजा के लिए लगाए गए पुष्प चुरा लिए थे। इसके कारण उन्हें दोष लगा और उससे मुक्ति पाने के लिए वे आनंदकानन यानी काशी पहुंचे।
काशी में अगस्त्यकुंड के समीप उन्होंने शिवलिंग स्थापित कर भगवान शिव की कठोर आराधना की। शिव महिमा का स्तवन करते हुए वे तपस्या में लीन हो गए। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दोष से मुक्त किया। इसी शिवलिंग को आगे चलकर पुष्पदंतेश्वर महादेव के नाम से जाना गया।
सात पीढ़ियों के कल्याण की मान्यता
पुष्पदंतेश्वर महादेव को लेकर मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक दर्शन-पूजन करने से मनुष्य के अनेक जन्मों के पापों का क्षय होता है। विशेष रूप से शिव महिम्न स्तोत्र का पाठ करते हुए महादेव की आराधना को अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। धार्मिक मान्यताओं में ऐसी आराधना से भक्त के साथ उसकी सात पीढ़ियों के कल्याण की बात भी कही गई है।
फूल-माला पर पैर पड़ जाए तो यहां दर्शन का महत्व
इस मंदिर से जुड़ी एक अनूठी मान्यता इसे काशी के दूसरे शिवालयों से अलग पहचान देती है। देवताओं को अर्पित फूल, माला, अक्षत अथवा पूजन सामग्री पर अनजाने में पैर पड़ने को धार्मिक परंपरा में दोष माना गया है। मान्यता है कि ऐसा होने पर पुष्पदंतेश्वर महादेव के दर्शन-पूजन से उस दोष का निवारण होता है।
पुराणों में भी मिलता है उल्लेख
पुष्पदंतेश्वर महादेव का उल्लेख लिंग पुराण और कूर्म पुराण से भी जोड़ा जाता है। वहीं शिवपुराण की रुद्र संहिता से जुड़ी मान्यता के अनुसार दैत्यराज पंचचूर्ण के संहार के प्रसंग में भगवान शिव ने पुष्पदंत को अपना दूत नियुक्त किया था। कथा है कि दैत्य के संहार के बाद जिस स्थान पर भगवान शिव ने अपना त्रिशूल रखा, उसी स्थान से इस शिवधाम की महिमा जुड़ी।
सावन में बढ़ जाता है दर्शन का महत्व
सावन में काशी के शिवालयों की तरह पुष्पदंतेश्वर महादेव के दर्शन का भी विशेष महत्व माना जाता है। श्रद्धालु यहां जलाभिषेक और पूजन के साथ शिव महिम्न स्तोत्र का पाठ करते हैं और भगवान से अपने जाने-अनजाने दोषों की क्षमा, पापों से मुक्ति तथा परिवार और आने वाली पीढ़ियों के कल्याण की कामना करते हैं।

