काशी में एक साथ नागेश्वर, ओंकारेश्वर और महाकालेश्वर के दर्शन, जानिए महामृत्युंजय मंदिर की महिमा

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काशी का महामृत्युंजय मंदिर: एक ही प्रांगण में तीन शिवलिंगों के दर्शन, महाकाल के स्मरण से मिटता है भय

वाराणसी। शिव की नगरी काशी में भगवान महादेव के असंख्य स्वरूप विराजमान हैं। धार्मिक मान्यता है कि भक्तों के कल्याण के लिए भगवान शिव के साथ उनके 68 तीर्थ भी काशी में निवास करते हैं। इन्हीं पौराणिक स्थलों में दारानगर रोड स्थित महामृत्युंजय महादेव मंदिर विशेष है। यहां श्रद्धालुओं को एक ही स्थान पर भगवान शिव के तीन प्राचीन स्वरूपों के दर्शन का अवसर मिलता है।

 

मंदिर और इसके आसपास के धार्मिक क्षेत्र में देव दारुका वन से आए दंडीश्वर यानी नागेश्वर, अमरकंटक से आए ओंकारेश्वर और उज्जयिनी से आए महाकालेश्वर की उपस्थिति की मान्यता है। यही कारण है कि महामृत्युंजय क्षेत्र को काशी के महत्वपूर्ण शिव स्थलों में गिना जाता है।

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काशी में विराजमान हैं उज्जैन के महाकाल

धार्मिक मान्यता के अनुसार उज्जयिनी के महाकाल स्वयं काशी में आकर विराजमान हुए। शास्त्रीय मान्यताओं में महाकाल को कलियुग के पापों और भय का नाश करने वाला बताया गया है। उनके नाम का स्मरण और दर्शन अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। मान्यता है कि महाकालेश्वर के दर्शन से श्रद्धालु को मोक्ष का मार्ग प्राप्त होता है।

 

मंदिर क्षेत्र में महाकाल का स्वरूप ओंकारेश्वर के पूर्व दिशा में स्थापित बताया जाता है। महाकाल के इस स्वरूप को दक्षेश्वर से भी जोड़ा जाता है और वर्तमान में श्रद्धालु इन्हें गौतमेश्वर नाम से भी पूजते हैं।

 

ब्रह्माजी की तपस्या से प्रकट हुए ओंकारेश्वर

पठानी टोला क्षेत्र में विराजमान ओंकारेश्वर की कथा भी विशेष है। काशीखंड की मान्यता के अनुसार यहां के ओंकारेश्वर को द्वादश ज्योतिर्लिंगों में शामिल ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग नहीं माना जाता, बल्कि उनका प्राकट्य *ब्रह्माजी की तपस्या* से जुड़ा बताया गया है। काशी में इस स्वरूप की पूजा हस्तिपालेश्वर के रूप में भी किए जाने की परंपरा बताई जाती है।

महाकाल कुंड में स्नान का विशेष महत्व

महाकालेश्वर से जुड़ा महाकाल कुंड भी धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना गया है। मान्यता है कि इस कुंड में स्नान के बाद महाकाल की विधि-विधान से पूजा करने वाले श्रद्धालु को संपूर्ण जगत की पूजा के समान पुण्यफल प्राप्त होता है। इसी धार्मिक क्षेत्र में दक्षिण दिशा में अंतकेश्वर के दर्शन का भी विधान बताया गया है। मान्यता है कि अंतकेश्वर के दर्शन करने वाले श्रद्धालु के मन से यमराज और मृत्यु का भय दूर होता है।

 

काशी में अवंतिकापुरी का प्रतीक है यह क्षेत्र

धार्मिक परंपरा में काशी में भी विभिन्न तीर्थों और पुरियों की प्रतीकात्मक उपस्थिति मानी गई है। इसी क्रम में इस क्षेत्र को उज्जयिनी यानी अवंतिकापुरी से जोड़कर देखा जाता है। वृद्धकालेश्वर के दक्षिण में महाकाल, उनके उत्तर में दक्षेश्वर और दक्षेश्वर के पूर्व में महाकालेश्वर लिंग की स्थिति का उल्लेख धार्मिक मान्यताओं में मिलता है।

सावन में दर्शन का बढ़ जाता है महत्व

सावन में महामृत्युंजय मंदिर में श्रद्धालुओं की आस्था और बढ़ जाती है। भक्त यहां भगवान शिव के विभिन्न स्वरूपों का दर्शन-पूजन और जलाभिषेक कर आरोग्य, दीर्घायु, अभय और मोक्ष की कामना करते हैं। एक ही धार्मिक क्षेत्र में शिव के इन पौराणिक स्वरूपों की मौजूदगी महामृत्युंजय मंदिर की महिमा को और विशिष्ट बनाती है।

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