Sawan 2026 : इस श्राप की वजह से, हजारों सालों से एक तरफ झुका हुआ है बनारस का ये शिव मंदिर

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भारत का वाराणसी शहर अपने धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व के लिए मशहूर है। यहां हर साल लाखों श्रद्धालु गंगा घाट के दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं। कहने को तो वाराणसी या बनारस में कई मंदिर हैं, लेकिन रत्नेश्वर मंदिर जैसा कोई और मंदिर नहीं है। इसकी एक खासियत इसे अन्य मंदिरों से अलग बनाती है। दरअसल, अन्य मंदिरों के अलावा यह मंदिर तिरछा खड़ा हुआ है। जी हां, इस प्राचीन मंदिर को देखकर इटली के पीसा टॉवर की याद आ जाती है। आपको शायद अब तक इस मंदिर के बारे में पता नहीं होगा, लेकिन यह एक ऐसी इमारत है, जो पीसा से भी ज्यादा झुकी हुई और लंबी है। पीसा टॉवर लगभग 4 डिग्री तक झुका हुआ है, लेकिन वाराणसी में मणिकर्णिका घाट के पास स्थित रत्नेश्वर मंदिर लगभग 9 डिग्री तक झुका हुआ है। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, मंदिर की ऊंचाई 74 मीटर है, जो पीसा से 20 मीटर ज्यादा है। एतिहासिक रत्नेश्वर मंदिर सदियों पुराना है।

मंदिर के झुके होने के पीछे की कहानी-

गंगा में डूबा रहता है मंदिर
वाराणसी का रत्नेश्वर मंदिर महादेव को समर्पित है। इसे मातृ-रिन महादेव, वाराणसी का झुका मंदिर या काशी करवात के नाम से भी जाना जाता है। रत्नेश्वर मंदिर मणिकर्णिका घाट और सिंधिया घाट के बीच में स्थित है। यह साल के ज्यादातर समय नदी के पानी में डूबा रहता है। कई बार पानी का स्तर मंदिर के शिखर तक भी बढ़ जाता है। ऐसा कहा जाता है कि मंदिर का निर्माण 19वीं शताब्दी के मध्य में हुआ था। मंदिर को 1860 के दशक से अलग-अलग तस्वीरों में चित्रित गया है।

गंगा में डूबा रहता है मंदिर-

मंदिर के झुके होने के पीछे की कहानी
यह मंदिर क्यों झुका हुआ है, इसके पीछे भी एक कहानी है। ऐसा कहा जाता है कि ये मंदिर राजा मानसिंह के एक सेवक ने अपनी मां रत्ना बाई के लिए बनवाया था। मंदिर बनने के बाद, उस व्यक्ति ने गर्व से घोषणा की कि उसने अपनी मां का कर्ज चुका दिया है। जैसे ही ये शब्द उनकी जुबान से निकले, मंदिर पीछे की तरफ झुकने लगा, यह दिखाने के लिए कि किसी भी मां का कर्ज कभी नहीं चुकाया जा सकता। इस तीर्थ का गर्भगृह वर्ष के ज्यादातर समय गंगा के जल के नीचे रहता है।

मंदिर की वास्तुकला -

मंदिर की वास्तुकला 
अगर हम इस मंदिर की वास्तुकला के बारे में बात करें, तो इसका निर्माण शास्त्रीय शैली में नगर शिखर और फामसान मंडप के साथ किया गया है। वास्तुकला के बारे में, मंडप सार्वजनिक स्थानों के लिए एक स्तंभित हॉल है। बहुत ही दुर्लभ संयोजन के साथ मंदिर पवित्र गंगा नदी के निचले स्तर पर बनाया गया है। दिलचस्प बात ये है कि जल स्तर मंदिर के शिखर के टॉप तक पहुंच सकता है। ऐसा लगता है कि जैसे बिल्डर को पता था कि इस मंदिर का ज्यादातर हिस्सा पानी के भीतर रहेगा , इसका निर्माण बहुत कम जगह पर किया गया है। हालांकि, यह मंदिर आज भी पानी के भीतर है, लेकिन इसे आज भी संरक्षित और मूल्यवान माना जाता है।

न कोई अनुष्ठान , न कभी बजती है घंटी-

न कोई अनुष्ठान, न कभी बजती है घंटी
मानसून के दौरान इस मंदिर में कोई भी अनुष्ठान नहीं किया जाता। बारिश के मौसम में कोई भी पूजा या प्रार्थना की आवाज सुनाई नहीं देती। घंटियों को बजते कोई देख और सुन नहीं सकता। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि यह एक शापित मंदिर है और पूजा अर्चना करने से उनके घर में कुछ बुरा हो सकता है।पीसा की झुकी मीनार से ज्यादा झुके होने के बाद भी यह मंदिर गुमनामी में खो गया है। लेकिन अब जब भी आप वारणासी की यात्रा पर जाएं, तो रत्नेश्यवर मंदिर की यात्रा करना ना भूलें।

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