भारत के इन मंदिरों में पुरुषों के जाने की है मनाही, खास नियमों के साथ महिलाएं करती हैं प्रवेश 

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किसी मंदिर या धार्मिक जगह पर जाना शांति और आनंद से भर देता है। मंदिर की बनावट, प्रसाद और परिसर में मौजूद दिव्य शक्ति एक अनूठा एहसास कराती है। भारत को तो मंदिरों की भूमि के रूप में जाना जाता है। भव्य, सरल, अलंकृत से लेकर पवित्र मंदिरों तक, आस्था के ये प्रतीक देश के लगभग हर कोने में देखे जा सकते हैं। भारत के हर एक क्षेत्र में कोई न कोई ऐसा मंदिर जरूर होगा जिसमें आस्था से जुड़ी हुई कई कहानियां और रहस्य छिपे हुए होंगे। कुछ ऐसे ही अनोखे और रहस्यमयी मंदिरों के बारे में आज हम आपको बताने जा रहे हैं जहां पुरुषों को जाने की मनाही हैं। केवल महिलाएं ही कुछ खास नियमों का पालन करते हुए मंदिर में प्रवेश कर सकती हैं। आइये जानते हैं इन मंदिरों के बारे में-

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कुमारी अम्मन मंदिर, कन्याकुमारी

कन्याकुमारी में स्थित कुमारी अम्मन मंदिर के गर्भगृह में मां भगवती दुर्गा की प्रतिमा है। यहां ब्रह्मचारियों और संन्यासियों को केवल मंदिर के द्वार तक जाने की अनुमति है। जबकि शादीशुदा पुरुषों को मंदिर परिसर में प्रवेश करने से रोक दिया जाता है। इस मंदिर के बारे में मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाने के लिए तपस्या की थी। मंदिर में केवल महिलाएं ही जा सकती हैं। यहां भगवती के कन्या रूप की पूजा होती है।

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चक्कूलाथूकावु मंदिर, केरल

केरल में स्थित यह एक और मंदिर है जो देवी भगवती को समर्पित है। इस मंदिर में, पुरुषों को वर्ष के एक विशिष्ट समय के दौरान प्रवेश करने की अनुमति नहीं है। यहाँ नारी पूजा हर साल दिसंबर के पहले शुक्रवार के दौरान आयोजित की जाती है जहां पुरुष पुजारी उन सभी महिला भक्तों के पैर धोते हैं जो 10 दिनों से उपवास कर रही हैं। इस दिन को धनु कहा जाता है और इस दिन केवल महिलाएं ही मंदिर में प्रवेश कर सकती हैं। इस दिन महिलाएं बड़ी संख्या में पूजा करने के लिए एकत्रित होती हैं।

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राजराजेश्वरी मंदिर, बिहार

उत्तर बिहार के मुजफ्फरपुर का राजराजेश्वरी मंदिर वैसे तो आम तौर पर पूरे साल श्रद्धालुओं के लिए खुला होता है। लेकिन बीच में एक ऐसा भी समय आता है, जब यहां पुरुषों के घुसने पर रोक लगा दी जाती है। उस खास समय में इसके मुख्य पुजारी, जो कि पुरुष हैं, उनको भी गर्भगृह में प्रवेश की अनुमति नहीं मिलती। यह मंदिर राज राजेश्वरी देवी को समर्पित है। इस मंदिर की गिनती बिहार के प्रमुख शक्तिपीठों में होती है। नवरात्रि के समय में इस मंदिर में लाखों लोगों की भीड़ इकट्ठा होती है। इस मंदिर में विराजमान देवी का स्वरुप षोडशी यानी सोलह वर्ष की कन्या का है। प्राचीन ग्रंथों के मुताबिक दश महाविद्याओं में षोडशी देवी का चौथा स्थान माना गया है। इनका मंत्र भी 16 अक्षरों का ही होता है। इस देवी की सोलह भुजाएं होती हैं। इस माता को त्रिपुर सुंदरी के नाम से भी जाना जाता है। बिहार के मुजफ्फपुर मंदिर में स्थित देवी षोडशी की प्रतिमा सोने से बनी हुई है। माना जाता है कि षोडशी देवी कुमारी कन्या हैं। वह महीने में 4 दिन रजस्वला होती हैं। इस दौरान कोई भी पुरुष मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकता है।

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कामाख्या मंदिर, असम

असम में स्थित कामाख्या मंदिर एक शक्तिपीठ है। इस मंदिर की गिनती देश के प्रमुख मंदिरों में होती है। देश का यह शक्तिपीठ एक मात्र ऐसा मंदिर है जहां पर पुरुषों को साल के कुछ निश्चित समय में मंदिर में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है। असम के गुवाहाटी के नीलांचल की पहाड़ियों के बीच स्थित यह शक्ति पीठ मंदिर में हर साल भव्य अंबुबाची मेले का आयोजन किया जाता है। अंबुबाची मेले के दौरान मंदिर का मुख्य द्वार चार दिनों के लिए बंद कर दिया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस स्थान पर देवी सती की योनि गिरी थी जिससे शक्तिपीठ बना। अंबुबाची मेले के दौरान देवी का मासिक धर्म का समय होता है। इस मौके पर चार दिनों के लिए मंदिर के परिसर में पुरुषों का प्रवेश करना वर्जित होता है। इन दिनों के दौरान महिला पुजारी ही मंदिर के सारे धार्मिक अनुष्ठान करती हैं।

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अट्टुकल भगवती मंदिर, केरल

केरल में अट्टुकल भगवती मंदिर में वर्ष के दौरान एक त्योहार का आयोजन किया जाता है जिसमें केवल महिलाएं ही प्रवेश कर सकती हैं। मंदिर की सभी धार्मिक गतिविधियां कुछ दिनों के लिए केवल महिलाओं के हाथों से ही होती है। अट्टुकल पोंगल के दौरान इस मंदिर में हजारों की संख्या में महिलाएं ही महिलाएं होती है।

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संतोषी माता मंदिर, जोधपुर

वैसे तो संतोषी माता का मंदिर और व्रत दोनों ही महिलाओं के लिए है, लेकिन पुरुष भी इस मंदिर में जाते हैं। जोधपुर में विशाल मंदिर है जो पौराणिक मान्यता रखता है। हालांकि, संतोषी माता की पूजा की अगर ऐतिहासिक कहानी देखी जाए तो ये 1960 के दशक में ही ज्यादा लोकप्रिय हुई, उसके पहले नहीं। संतोषी माता के मंदिर में शुक्रवार को महिलाओं को खास पूजा करने की इजाजत है और महिलाएं ही इस व्रत को रखती हैं। व्रत कथाओं में संतोषी माता की भक्त सत्यवती की कहानी कही जाती है। शुक्रवार को यहां पुरुषों के जाने की मनाही है। हालांकि, ये मनाही सिर्फ एक दिन की ही है, लेकिन फिर भी इसे जरूरी माना जाता है।

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