Chaitra Nanratri 2024: काशी का ये चमत्कारिक शक्ति पीठ है बेहद प्रसिद्ध, जहां दर्शन मात्र से पूरी होती हैं सभी मुरादें

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बाबा विश्वनाथ का शहर माने जाने वाले शहर बनारस, जिसे काशी भी कहा जाता है, देश की धार्मिक राजधानी माना जाता है। काशी नगरी बाबा विश्वनाथ के लिए ही नहीं बल्कि शक्तिपीठ के लिए भी जानी जाती है। ये शहर शक्ति उपासना का केंद्र भी है। मान्यता है कि जिन स्थानों पर देवी के अंग गिरे वो सभी स्थान शक्तिपीठ बन गये। कुल 51 शक्तिपीठ माने जाते हैं। जब भगवान शिव वियोगी होकर भगवती सती के मृत शरीर को अपने कंधे पर रखकर इधर-उधर घूम रहे थे तब मां सती के दाहिने कान की मणि या कर्ण कुण्डल या आंख जिस स्थान पर आकर गिरे, उस स्थान को आज मां विशालाक्षी के पावन धाम के रूप में जाना जाता है जो कि काशी में है। 

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मान्यता है कि भगवान शिव ने इन सभी शक्तिपीठों पर जाकर साधना की थी और अपने स्वरूप से काल भैरव को उत्पन्न किया था। काशी में भी इस शक्तिपीठ के पास काल भैरव भी विराजमान हैं, भक्ति, शक्ति और समृद्धि प्रदान करने वाले पावन 51 शक्तिपीठों में से एक है मां विशालाक्षी देवी का दिव्य धाम। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार काशी में मां विशालाक्षी बाबा विश्वनाथ की अर्धांगिनी के रूप में विराजमान हैं, प्रतिदिन बाबा विश्वनाथ यहीं रात्रि शयन करते हैं, काशी की टेढ़ी मेढी गलियों के बीच देवी का यह शक्ति पीठ है जहां दर्शनों के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ लगी रहती है। 

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51 शक्तिपीठों में से एक
विशालाक्षी मंदिर के महंत राजनाथ तिवारी बताते हैं कि यह मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है। कथाओं के अनुसार इसी जगह पर माता के दाहिने कान की मणि ,कर्ण कुंडल या आंख गिरे थे। यही वजह है कि इस मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। इसके अलावा भी नवरात्रि के दिनों में यहां बहुत लम्बी कतार देखने को मिलती है। काशी में विराजमान माता विशालाक्षी के दर्शन से रोग, संताप आदि दूर होते हैं और संतान की प्राप्ति होती है। जिन कन्याओं का विवाह नहीं हो पा रहा हो, या विवाह में कुछ न कुछ बाधा आ जाती हो, उन कन्याओं के लगातार 41 दिनों तक माता विशालाक्षी के दर्शन करने से विवाह सम्बंधित सभी परेशानी दूर हो जाती हैं। 

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मंदिर की संरचना
माता विशालाक्षी का यह मंदिर द्रविण शैली में बनाया गया है और इसकी आकृति दक्षिण भारत के मंदिर के जैसी ही है। इस मंदिर में देश के दूर दूर के इलाके के श्रद्धालुओं के अलावा बड़ी संख्या में दक्षिण भारतीय श्रद्धालु भी दर्शन के लिए आते हैं। यहां देवी को माला, फूल और प्रसाद के साथ श्रृंगार का सामान चढ़ाया जाता है। 

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पौराणिक कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान शिव की अर्धांगिनी माता सती के पिता दक्ष प्रजापति के राजमहल में यज्ञ के दौरान पति के अपमान से दुखी सती ने उसी यज्ञ कुंड में शरीर त्याग दिया था। जिसके बाद भगवान शिव माता सती का शव लेकर तांडव करने लगे। इस दौरान सृष्टि के रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने माता सती के शरीर को अपने सुदर्शन चक्र से टुकड़ों में काट दिया था। माना जाता है जिन जिन जगहों पर सती के शरीर का अंग गिरा वह स्थान शक्तिपीठ कहलाता है। 

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