Jitiya Vrat 2025: जितिया व्रत में महिलाएं क्यों पहनती हैं जिउतिया धागा? जानें इसका महत्व

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जितिया व्रत को जीवित्पुत्रिका या जिउतिया व्रत के नाम से भी जाना जाता है. यह व्रत मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में बड़े उत्साह के साथ किया जाता है. इस व्रत में महिलाएं अपनी संतान की लंबी उम्र और खुशहाल जीवन के लिए निर्जला व्रत करती हैं. जितिया व्रत का उत्सव बिहार में 3 दिनों तक मनाया जाता है, जिसे सबसे कठिन उपवास में से एक माना जाता है. जितिया व्रत से जुड़ी कई परंपराएं और मान्यताएं हैं, जिनमें से एक है इसमें लाल या पीले रंग का धागा में जिउतिया लॉकेट पहनना.

जिउतिया धागा क्यों पहनते हैं?
जितिया व्रत में पहने जाने वाले धागे को जिउतिया माला या जिउतिया लॉकेट कहते हैं. इस व्रत में इस लॉकेट का विशेष महत्व माना जाता है. ऐसा माना जाता है कि इस माला को पहने बिना यह उपवास पूरा नहीं होता है. यह लाल या पीले रंग का धागा होता है, जिसमें सोने या चांदी के लॉकेट या गांठें बांधी जाती हैं. लॉकेट की संख्या संतान की संख्या के मुताबिक होती है और शुभता के लिए एक अतिरिक्त लॉकेट या गांठ जोड़ी जाती है. कुछ लॉकेट पर भगवान जीमूतवाहन की आकृति भी बनी होती है.

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जितिया व्रत में लॉकेट का महत्व
जितिया व्रत में यह माला या धागा इसलिए पहना जाता है, क्योंकि यह संतान की दीर्घायु, सुरक्षा और अच्छे स्वास्थ्य की कामना का प्रतीक होता है. यह मां की आस्था और मातृत्व के समर्पण को भी दर्शाता है. बिना जिउतिया के व्रत अधूरा माना जाता है, क्योंकि इसके बिना उपवास का मनचाहा प्रभाव नहीं होता और व्रत अधूरा रह जाता है.

संतान की दीर्घायु:- यह धागा और लॉकेट संतान की लंबी आयु और उनके जीवन में आने वाले संकटों को टालने का प्रतीक माना जाता है.

संकल्प का प्रतीक:- यह सिर्फ एक आभूषण नहीं, बल्कि मां की आस्था और संतान के लिए किए गए संकल्प का प्रतीक भी माना जाता है.

व्रत की पूर्णता:- मान्यता है कि बिना जिउतिया धागा और लॉकेट के जितिया व्रत अधूरा माना जाता है. साथ ही, इसके बिना व्रत का फल प्राप्त नहीं होता है.

धार्मिक महत्व:- इस धागे को “संरक्षण सूत्र” भी माना गया है और इसके पहनने से व्रत की सफलता सुनिश्चित होती है.

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