पश्चिम एशिया के युद्ध हालातों के बीच भारत की आर्थिक तैयारी
डॉ. मयंक चतुर्वेदी
पश्चिम एशिया में अमेरिका, इज़रायल और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को अनिश्चितता के दौर में ला खड़ा किया है। समुद्री व्यापार मार्गों पर खतरा बढ़ रहा है, बीमा लागत में उछाल आया है और कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता ने वैश्विक बाजार को बेचैन कर दिया है। भारत जो ऊर्जा आयात और निर्यात दोनों के लिहाज से इस क्षेत्र पर काफी निर्भर है, ने हालात की गंभीरता को समझते हुए त्वरित और समन्वित कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। सरकार का स्पष्ट संदेश है कि अंतरराष्ट्रीय संकट चाहे जितना भी गहरा क्यों न हो भारत का व्यापारिक पहिया रुकने नहीं दिया जाएगा।
पश्चिम एशिया भारत के लिए आर्थिक जीवनरेखा है। भारत अपने कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से आयात करता है। हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य और लाल सागर जैसे समुद्री मार्ग यदि असुरक्षित होते हैं, तब इसका सीधा प्रभाव भारत की ऊर्जा सुरक्षा और निर्यात-आयात गतिविधियों पर पड़ता स्वभाविक है। हाल के घटनाक्रमों में जहाजों पर हमलों और सैन्य गतिविधियों में तेजी ने बीमा कंपनियों को युद्ध जोखिम प्रीमियम बढ़ाने के लिए मजबूर किया है। इन हालातों के बीच केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने सभी संबंधित मंत्रालयों, प्रमुख लॉजिस्टिक्स कंपनियों और व्यापार सुविधा भागीदारों के साथ एक उच्चस्तरीय परामर्श बैठक आयोजित की। उन्होंने सोशल मीडिया ‘एक्स’ पर जानकारी साझा करते हुए कहा कि सरकार स्थिति पर लगातार नजर रखे हुए है और किसी भी संभावित व्यवधान से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है। बैठक में समुद्री मार्गों की सुरक्षा, बीमा लागत में उछाल, वैकल्पिक शिपिंग मार्गों और निर्यात-आयात प्रक्रियाओं में संभावित बाधाओं पर विस्तार से चर्चा की गई।
प्रक्रियात्मक लचीलापन से निर्यातकों को राहत
सरकार ने संकेत दिया है कि निर्यात से जुड़े प्राधिकरणों में प्रक्रियात्मक लचीलापन दिया जाएगा ताकि किसी भी तरह की कागजी देरी व्यापार को प्रभावित न करे। सीमा शुल्क और बंदरगाह प्राधिकरणों के साथ समन्वय बढ़ाया जाएगा, जिससे माल की निकासी और क्लीयरेंस प्रक्रिया में बाधा न आए। यदि किसी समुद्री मार्ग पर खतरा बढ़ता है तो वैकल्पिक मार्गों का उपयोग तेजी से किया जा सके, इसके लिए भी तैयारी की जा रही है।
अंतर-मंत्रालयी समूह का गठन सेआपूर्ति श्रृंखला को मजबूती
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सरकार ने “आपूर्ति श्रृंखला सुदृढ़ता के लिए अंतर-मंत्रालयी समूह” का गठन किया है। इस समूह में वित्तीय सेवा विभाग, विदेश मंत्रालय, पोत परिवहन मंत्रालय, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय और Central Board of Indirect Taxes and Customs यानी केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड के प्रतिनिधि शामिल हैं। यह समूह विभिन्न विभागों के बीच समन्वय स्थापित करेगा और आपात स्थिति में त्वरित निर्णय सुनिश्चित करेगा, ताकि निर्यात और आयात गतिविधियां बाधित न हों।
बैंक और बीमा कंपनियों से संवाद और वित्तीय सुरक्षा कवच
बीमा लागत में वृद्धि और भुगतान जोखिम को देखते हुए सरकार ने बैंकों और बीमा कंपनियों के साथ सक्रिय संवाद शुरू किया है। निर्यातकों को आश्वस्त किया गया है कि व्यापारिक ऋण सुविधाओं में लचीलापन बरता जाएगा और बीमा दावों के निपटारे में तेजी लाई जाएगी। यदि हालात बिगड़ते हैं तो विशेष वित्तीय सहायता पैकेज पर भी विचार किया जा सकता है। इससे छोटे और मध्यम निर्यातकों को राहत मिलने की उम्मीद है।
हेल्पलाइन से त्वरित समाधान का भरोसा
व्यापार समुदाय की सहायता के लिए सरकार ने हेल्पलाइन जारी की है। किसी भी समस्या के समाधान के लिए एडीजी1 डीजीएफटी गव इन पर ईमेल किया जा सकता है। इसके अलावा विदेश व्यापार महानिदेशालय की हेल्पडेस्क पर 1800 572 1550 और 1800 111 550 नंबरों पर संपर्क किया जा सकता है। यह पहल दर्शाती है कि सरकार संकट की घड़ी में व्यापारियों के साथ खड़ी है।
मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार व्यापारियों और निर्यातकों के हितों की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। सरकार का लक्ष्य एक स्थिर, संवेदनशील और उत्तरदायी व्यापारिक वातावरण सुनिश्चित करना है, ताकि अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों के बावजूद भारत की आर्थिक गति प्रभावित न हो।
यदि कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आता है तब इसका सीधा असर महंगाई, परिवहन लागत और औद्योगिक उत्पादन पर पड़ेगा। हालांकि भारत ने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने के प्रयास किए हैं, फिर भी पश्चिम एशिया की स्थिरता देश की आर्थिक सेहत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे में सरकार की प्राथमिकता है कि पेट्रोलियम आपूर्ति निर्बाध बनी रहे और रणनीतिक भंडार पर सतत निगरानी रखी जाए। ऐसे में उच्चस्तरीय बैठकों से लेकर अंतर-मंत्रालयी समूह के गठन, हेल्पलाइन जारी करने और वित्तीय संस्थानों के साथ संवाद तक हर कदम यह दर्शाता है कि भारत ने संकट प्रबंधन को गंभीरता से लिया है।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

