दो महीने तक लिवाली करने के बाद शेयर बाजार में बिकवाल बने एफपीआई, सितंबर में 7,443 करोड़ के शेयर बेचे

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दो महीने तक लिवाली करने के बाद शेयर बाजार में बिकवाल बने एफपीआई, सितंबर में 7,443 करोड़ के शेयर बेचे


नई दिल्ली, 06 सितंबर (हि.स.)। जुलाई और अगस्त में लगातार लिवाल (बायर) की भूमिका में बने रहने के बाद विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) सितंबर की शुरुआत में बिकवाल (सेलर) की भूमिका में आ गए। सितंबर के पहले चार कारोबारी दिन में ही विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से 7,443 करोड़ रुपये की निकासी कर ली। माना जा रहा है कि कच्चे तेल की कीमत में आई तेजी, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी और डॉलर के मजबूत होने से विदेशी निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता प्रभावित हुई है। यही वजह है कि विदेशी निवेशक दुनिया भर के ज्यादातर स्टॉक मार्केट में बिकवाली कर अपने पैसे की निकासी कर रहे हैं।

आपको बता दें कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) साल 2026 में ज्यादातर समय तक बिकवाल (सेलर) की भूमिका में बने रहे हैं। फरवरी, जुलाई और अगस्त के अलावा 2026 के शेष सभी महीनों में विदेशी निवेशक लगातार बिकवाली करके घरेलू शेयर बाजार से अपना पैसा निकालते रहे हैं। खासकर, मार्च के महीने में विदेशी निवेशकों ने जोरदार बिकवाली की। इसके बाद जुलाई के पहले के लगातार तीन महीने यानी जून, मई और अप्रैल में भी एफपीआई घरेलू शेयर बाजार में बिकवाली कर अपना पैसा निकालने में लगे हुए थे। लेकिन, जुलाई के महीने में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने बिकवाली की तुलना में लिवाली अधिक की। इस महीने के दौरान विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने 20,199 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश किया।

साल 2026 में जुलाई और अगस्त में हुई खरीदारी के पहले सिर्फ फरवरी में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक खरीदार की भूमिका में नजर आए थे। फरवरी में एफपीआई ने कुल 22,615 करोड़ रुपये का निवेश किया था। सेंट्रल डिपॉजिटरी सर्विसेज (इंडिया) लिमिटेड (सीएसडीएल) के आंकड़ों के अनुसार जुलाई के पहले जून के महीने में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से 49,340 करोड़ रुपये की निकासी की थी।

अगर साल 2026 की शुरुआत से ही विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की लिवाली और बिकवाली के आंकड़े की बात करें, तो जनवरी के महीने में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने घरेलू शेयर बाजार में 35,962 करोड़ रुपये की बिकवाली की थी। फरवरी में एफपीआई ने बिकवाली की जगह लिवाली पर जोर दिया। इस महीने इन्होंने भारतीय शेयर बाजार में 22,615 करोड़ रुपये का निवेश किया।

मार्च में एक बार फिर स्थिति बदल गई। इस महीने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने स्टॉक मार्केट में लगातार चौतरफा बिकवाली कर रिकॉर्ड 1.17 लाख करोड़ रुपये की निकासी की। अप्रैल में भी एफपीआई की ओर से हो रही बिकवाली का सिलसिला जारी रहा। इस महीने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने 60,847 करोड़ रुपये के शेयर बेच डाले। इसके बाद मई के महीने में भी एफपीआई ने स्टॉक मार्केट में 32,963 करोड़ रुपये के शेयर बेच दिए। जून में भी एफपीआई ने घरेलू शेयर बाजार से 49,340 करोड़ रुपये की निकासी की। इसके बाद जुलाई में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने 20,199 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश किया, जबकि अगस्त में एफपीआई ने घरेलू शेयर बाजार में 30,919 करोड़ रुपये डाले।

इन आंकड़ों से साफ है कि 2026 में जनवरी से लेकर अगस्त के दूसरे सप्ताह तक के कारोबार में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक ज्यादातर समय बिकवाल की भूमिका में ही बने रहे हैं। फरवरी, जुलाई और अगस्त में एफपीआई द्वारा की गई खरीदारी के बावजूद जनवरी से लेकर अभी तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक लिवाली और बिकवाली मिलाकर घरेलू शेयर बाजार से 2,29,822 करोड़ रुपये की शुद्ध निकासी कर चुके हैं। इसके पहले साल 2025 में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने लिवाली और बिकवाली के आंकड़ों को मिला कर भारतीय शेयर बाजार से कुल 1.66 लाख करोड़ रुपये की निकासी की थी।

टीएनवी फाइनेंशियल सर्विसेज के सीईओ तारकेश्वर नाथ वैष्णव का कहना है कि पिछले कुछ दिनों के दौरान एफपीआई की बिकवाली के पीछे सबसे बड़ी वजह कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी ही है। इससे भारत में महंगाई और चालू खाते की स्थिति को लेकर चिंता बढ़ गई है। इसके अलावा अमेरिकी बॉन्ड यील्ड बढ़ने और डॉलर सूचकांक के मजबूत बने रहने से उभरते बाजारों के प्रति विदेशी निवेशकों की जोखिम लेने की धारणा भी कमजोर हुई है।

इसी तरह खुराना सिक्योरिटीज एंड फाइनेंशियल सर्विसेज के सीईओ रवि चंदर खुराना का कहना है कि कच्चे तेल की कीमतें, अमेरिका-ईरान के बीच लगातार बदल रही जियो-पॉलिटिकल सिचुएशन और अमेरिकी महंगाई के आंकड़ों का डर भी विदेशी निवेशकों की ओर से भारतीय शेयर बाजार में आने वाले फंड के फ्लो को प्रभावित करेगा। अमेरिका के केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व की सितंबर के मध्य में ही ब्याज दरों की समीक्षा करने के लिए मौद्रिक नीति समिति की बैठक होने वाली है। इस बैठक के नतीजे अमेरिकी बाजार के लिए काफी महत्वपूर्ण होंगे। साथ ही इनका असर दुनिया के दूसरे देशों में भी विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की चाल पर भी पड़ेगा।

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हिन्दुस्थान समाचार / योगिता पाठक

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